गुण निर्गुण के

वक्ता: हम, जब भी कभी कुछ करते हैं, उस करने का अनिवार्य परिणाम थकान है | करते किस खातिर हैं? कि कुछ पा लें | क्या पा लें? सुख पा लें | हमारा एक-एक कदम है तो सुख की आकांक्षा ही है। लेकिन कुछ भी करने के साथ अनिवार्यतः मिल क्या जाता है? थकान | हमने बात की थी कि थकान शारीरिक नहीं होती | शरीर तो मशीन है | वास्तविक रूप से हमें जो थकान महसूस होती है वो मानसिक है | थकान के आने का अर्थ ही यही है कि मन का एक हिस्सा दूसरे के विरूद्ध खड़ा हो गया है | फिर वहाँ थकान होती है, फिर वहाँ ज़ोर-ज़बरदस्ती भी करनी पड़ती है |

पूर्ण को थकान नहीं होगी | पूर्ण मतलब जो बंटा हुआ नहीं है | वहाँ कोई थकान नहीं होती | पूर्ण में चक्र लगातार चलता रहता है, व्यवस्थायें चलती रहती हैं, कर्म होते रहते हैं, पर ना कोई रुकता है, ना कोई अवकाश लिया जाता है, ना कोई थकता है | अर्जुन से कृष्ण क्या कह रहे हैं? अर्जुन से कह रहे हैं कि देख अर्जुन जो उचित कर्म है तू क्यों उसको रोक रहा है। मेरी तरफ देख, मुझे तो पाने को कुछ भी नहीं है लेकिन फिर भी मैं दिन रात कर्म कर रहा हूँ | कृष्ण नहीं थकेंगे | ठीक इसलिए नहीं थकेंगे क्योंकि उन्हें पाने को कुछ नहीं है | कृष्ण अर्जुन से क्या कह रहे हैं? मुझे पाने को कुछ नहीं है, मैं फिर भी दिन-रात कर्म कर रहा हूँ |

कृष्ण का आशय यहाँ पूर्ण से है | वो कह रहे हैं कि ये जो पूरी दुनिया का सारा व्यापार है, ये और कौन कर रहा है? ये जो पूरा काम धन्धा चल रहा है, ये जो सारी गति दिखाई दे रही है, ये गति किसकी है? ये मेरी ही तो गति है | अब देख, मुझे कुछ पाने को नहीं है, फिर भी मैं निरंतर कर्म में रत हूँ | निरंतर, बिना रुके, अहर्निष, कोई थकान नहीं | कोई थकान इसलिए नहीं है क्योंकि कोई व्यक्तिगत इच्छा नहीं है | तो ये बड़ा ज़बरदस्त सूत्र हाथ लग रहा है | क्या कह रही है कुरान? कि अल्लाह को थकान नहीं, अल्लाह को नींद नहीं | थकान तो उसे हो ना जिसे अपने से बाहर कुछ पाना हो | वो थकेगा, उसके मन के टुकड़े होंगे | मन ही थकता है | यहाँ तो खेल ही पूर्ण का है, तो थकान कैसे होगी?

एक विचित्र बात है, इसको देखो कि योगी को पाने को कुछ नहीं, लेकिन उसके पास अक्षय ऊर्जा है, कोई थकान नहीं | और आम आदमी के पास पाने को लक्ष्य ही लक्ष्य हैं लेकिन उन लक्ष्यों के सामने खूब थकान | तो नतीजा क्या निकलेगा? कुंठा | इतना है जो पाना है और मैं कैसा बैठा हूँ? थका-थका सा | वो सोच रहा है कि थकान, अड़चन है पाने के रास्ते में | आम आदमी का यही सोचना है ना? थकान क्या है? पाने के रास्ते में अड़चन है | वो ये नहीं देख रहा है कि थकान पाने के रास्ते में अड़चन नहीं है | थकान, पाने की कोशिश का अंजाम है | जिसको नहीं पाना, उसे सब उपलब्ध है और वो थक भी नहीं रहा है | नहीं तो क्या है? वही है कि आप तीस-पैंतीस के होते नहीं हो और टी.वी. पर विज्ञापन आना शुरू हो जाता है, ‘थर्टी प्लस, रीवाईटल’ और आप सुबह-सुबह पैन्ट कस कर, टाई लगा कर और तीन-चार गोलियाँ फाँक कर दुनिया फ़तह करने निकल पड़ते हो | इसको ऐसे भी कह लेना, समझ लेना।

जब तक तुम्हारे उद्देश्य रहेंगे, तुम्हारी इच्छा रहेगी और तुम्हारी ऊर्जा रहेगी, तक सब कुछ सीमित रहेगा |

जो सीमित है वो ख़त्म हो जायेगा | जो सीमित है वो ख़त्म हो कर रहेगा क्योंकि उसकी गिनती है | तुम्हारे उद्देश्य, तुम्हारी इच्छा, तुम्हारी ऊर्जा, नतीजा थकान | थकान का अर्थ ही यही है – चुक रहा हूँ, संसाधनों की कमी पड़ रही है | पर जैसे ही तुम्हारे उद्देश्यों की जगह विराट के उद्देश्य हो जायेंगे, तुम्हारी थकान भी मिट जाएगी। और उसका उद्देश्य वैसा होता ही नहीं जैसा हमारा होता है | निरुद्देश्यता उसका उद्देश्य है |

जैसे ही व्यक्तिगत इच्छा की जगह, उसकी इच्छा हो जाएगी; वैसे ही व्यक्तिगत ऊर्जा की जगह उसकी ऊर्जा हो जाती है |

फिर थकान नहीं, फिर संसाधनों का अभाव नहीं | फिर जहाँ से कुछ मिलता नहीं दिखाई देता, वहाँ से मिलने लगता है | यही जादू है | लड़ाईयां फिर तुम हार-हार के जीतना शुरू कर देते हो | तुम कहोगे, ‘हम तो सीमित हैं, हम तो सीमित हैं, हमारी ऊर्जा भी सीमित है, हमारी इच्छाएँ भी सीमित हैं, विराट कैसे हो जायेंगे?’ जो समर्पित हुआ, जिसने अपने सीमित को ही पूरी तरह समर्पित कर दिया, वो पायेगा कि अस्तित्व बड़े विचित्र तरीकों पर चलता है | तुम मर के जी उठते हो, तुम हार के जीत जाते हो | जीज़स हैं, मंसूर हैं, एक आम आदमी की नज़र से देखो तो इन्हें क्या मिला? क्या मिला? जवान आदमी हैं जीज़स, और उनको मार दिया गया | उनको व्यक्ति समझोगे तो उनसे बड़ा हारा हुआ इंसान नहीं हो सकता कि जब तक जी रहे थे किसी ने उनकी सुनी नहीं और फिर उन्हें मार दिया गया | व्यक्ति उन्हें अगर जाना तो उनसे हारा हुआ इंसान नहीं हो सकता | पर ज्यों ही देखो कि व्यक्ति नहीं है, यहाँ कुछ और ही बात है, तो कहोगे कि ये इंसान तो ज़बरदस्त रूप से जीता | मर के जीत गया | मर के ही जीता जा सकता है | बात आ रही है समझ में ? क्या संसाधन थे जीज़स के पास? कौन सी दौलत थी ? कौन सी सल्तनत थी? पर जीत देखो | समझ रहे हो बात को?

श्रोता १: मैं अल्लाह के सिवा किसी और को क्या माँगूँ? वो तो सबका पिता है।

वक्ता: आज हम बात कर रहे थे संतों की कि वो परम दासता को पाते हैं वो और उसके साथ मालिक बन जाते हैं | ठीक यही बात कुरान समझा रही है, ‘उसके गुलाम हो जाओ तो सबके मालिक हो गए’ | दो ही विकल्प हैं, उस एक के गुलाम हो जाओ, फिर किसी और का गुलाम होने की ज़रूरत नहीं है। और उस एक को ठुकराए रहो और दुनिया भर के गुलाम बने रहो | बात समझ में आ रही है? दो ही विकल्प हैं- एक की दासता स्वीकार कर लो और याद रखना उसकी दासता प्रेम की दासता है | वो बंधन नहीं है, वो प्रेम है | तो या तो एक के सामने झुक जाओ और फिर कभी झुकने की ज़रुरत नहीं पड़ेगी, ऐसी मालकियत मिल जाएगी | या फिर उस एक से विमुख रहो और इसके सामने, उसके सामने और दुनिया जहान के सामने, छोटी-मोटी वासनाओं के सामने घुटने टेके रहो| चुनाव तुम्हारा है, जो चुनना है चुनो | तो वही कहा जा रहा है कि दूसरे किसी के सामने नहीं झुकेंगे |

एक, बस एक, समग्र समर्पण | और दूसरा कोई नहीं है हमारा मालिक | लेकिन यहाँ पर चूक मत कर देना | जब कहा जा रहा है कि एक से समर्पण तो इसका अर्थ ये नहीं है कि बाकि सब से बैर है क्योंकि वो जो एक है, वही सब कुछ है | तो वो जो उस एक से जुड़ गया, वो सबके प्रति प्रेम-भाव से भर गया, सबके प्रति | नहीं तो अहंकार इस बात को पकड़ सकता है | तुम प्रेम की जगह तलवार उठा सकते हो कि अल्लाह के समक्ष तो बंदगी है और बाकि अस्तित्व के प्रति शत्रुता है, ना ऐसा नहीं | जिसने उसके सामने बंदगी कर ली, उसके मन में सबके प्रति, समस्ति के प्रति प्रेमभाव ही रहेगा | तो बताओ कि अगर अपनी ज़िन्दगी में ये पाते हो कि इधर-उधर से, जाने-अनजाने, छोटे-बड़े तमाम प्रभाव तुम पर हावी हो जाते हैं, जिसको देखो वही मालिक बन बैठता है, तो इसका कारण क्या है? और मालिक बनने का क्या मतलब है? मालिक बनने का ये मतलब है कि गए किसी शॉपिंग मॉल में और वहाँ पर एक नयी कमीज़ देखी और वो कमीज़ तुम्हारी मालिक बन गई | कैसे मालिक बन गई?

श्रोता २: मन पर हावी हो गई |

वक्ता: कि वो मन पर हावी हो गई | तो तुम पाते हो कि गुज़र रहे हो और नाक में फिज़ा की गंध आई और तुम आकर्षित हो गए, किसी ने नई कमीज़ दिखाई और तुम खिंच गए कि ख़रीद ही लेते हैं | किसी ने तुमसे दो बातें तारीफ की बोल दीं और खुश हो गए, और किसी ने सी ज़रा-सी निंदा कर दी तो उदास हो गए| ये सब गुलामियाँ हैं | अगर तुम पाते हो कि जीवन ऐसी गुलामियों से भरा हुआ है कि तुम्हारे हज़ार मालिक हैं, तो एक ही अर्थ है इसका। क्या?

श्रोता ३: कि उस एक से दूर हैं |

वक्ता: कि एक तुम्हारा मालिक नहीं है | अगर हज़ार मालिक हैं और हममें से अधिकांश के हज़ार मालिक हैं, अगर पाते हो कि ज़िन्दगी में हज़ार मालिक मौजूद हैं तो बात बहुत सीधी है; एक से दूर हो तो हज़ार तुम पर चढ़ बैठे हैं | जिसे हज़ार की गुलामी ना करनी हो, वो ऐसे हो जायें; मैं दासों का दास।

(कुरान की आयतों पर चर्चा कुछ समय पश्चात फिर आरंभ हुई। रात्रि का समय है)

वक्ता: बहुत बढ़िया | ‘वह न जन्म देता है और न उसका जन्म होता है’| बड़ी कीमती आयत है | जीज़स लगातार बोलते रहे, “माय फ़ादर , गॉड माय फ़ादर”| मोहम्मद ने नहीं बोला, मोहम्मद ने दावा नहीं किया कि मैं बेटा हूँ उसका | इतना ही कहा कि पैगम्बर हूँ | पैगाम लाया हूँ उसका, सन्देश लाया हूँ | इतनी हैसियत नहीं मेरी कि कहूँ कि बेटा हूँ | नहीं कहूँगा | है सब कुछ उसी के जोर से, है सब कुछ उसी के वजूद से, मात्र वजूद उसी का है |  पर ये दावा बड़ा महँगा पड़ जायेगा कि उसका कोई बेटा है या बेटी है | या तो कहो कि सब कुछ उसी की उत्पत्ति है, उसी की संतान हैं | जैसे ब्रह्म सूत्र कहते हैं – जन्मादेस्य यतः | वो कौन जो सब को जन्म देता है? या तो कहो कि पत्थर और रेत और हवा और बादल, सबका पिता वो है | पर ये तुम कह नहीं पाओगे | ये तुम्हारी सामर्थ्य से ही बाहर है | कहोगे भी तो तुम्हारा कहना झूठ होगा |

श्रोता २: पर जब जीसस ने कहा, ‘मेरा पिता’, तो उनका तात्पर्य भी यही था|

वक्ता: हाँ | जीसस और मोहम्मद एक ही बात कह रहे हैं| अर्थ एक ही है। जीसस हों, मोहम्मद हों, कृष्ण हों, एक ही बात कहते हैं | पर हम यहां चर्चा कर रहे हैं कि शब्दों में यह सूक्ष्म भेद क्यों है? अर्थ एक ही है। लाओ त्ज़ु और मीरा में तो कुछ भी समान नहीं है, उनके शब्दों का अर्थ भी सदा से समान है|

प्रश्न यह है कि मोहम्मद ने क्यों कभी दावा नहीं किया कि मैं उसका बेटा हूँ| हम उसकी बात कर रहे हैं | या तो उस जगह पर पहुँच जाओ जहाँ तुम कह सको कि सब कुछ, कण-कण उतना ही उससे आया है, जितना मैं आया हूँ | पर तुम ये कभी कह नहीं पाते | तुम क्या बोलते हो? तुम बोलते हो उदाहरण के लिए कि इंसान उसकी सर्वश्रेष्ठ कृति है | जैसे ही तुमने कहा कि इंसान उसकी सर्वश्रेष्ठ कृति है, अब तुम क्या ये कह पाओगे कि मैं उतना ही उसका बेटा हूँ जितना कि कोई पक्षी, कोई जानवर, कोई कुत्ता | क्या कह पाओगे? तुम्हारे बस में नहीं है | जब तक तुम ये नहीं कह सकते कि कोई भेद नहीं, सब एक बराबर हैं, उससे ही आये हैं, जब तक साफ़-साफ़, दिल से ये नहीं कह सकते, तब तक तुम ये भी ना दावा करो कि मैं उसका बेटा हूँ | और जब तुम उस जगह पर पहुँच जाओगे जहाँ तुम ये कह सको कि मैं उसका बेटा हूँ, तब तुम्हें कहने की और दावा करने की ज़रूरत ही नहीं बचेगी | तब तक तुम दावा करो मत क्योंकि दावा करोगे तो बेईमानी होगी | तब तक दावा करो ही मत |

तो इसलिए बड़ी ईमानदारी की बात है कि कह दिया गया है, ‘ना वो कहीं से आया है और ना उससे कोई आगे बढ़ता है; वो प्रथम है’ | बस ख़त्म | उसका कोई कुनबा नहीं, उसका कोई दोस्त-यार नहीं | वो निसंग है | समझ में आ रही है बात? उसका खानदान मत खड़ा कर देना | ब्रह्म झुंड में नहीं पाया जाता | समझ रहे हो? ‘न वो कहीं से आया है’, यहाँ तक तो ठीक है, हम समझते हैं कि वो अकारण है | हमारी दिक्कत तब होती है जब हमसे कहा जा रहा है कि उसका कोई बेटा नहीं है | हम कहते हैं कि ये कैसी बात | हमने तो आज तक यही सुना था कि हम सब ईश्वर के ही बच्चे हैं, तो कुरान फिर ये क्यों कह रही है कि उसका कोई बेटा नहीं? क्या वो हमारे पिता के समान नहीं है? निश्चित रूप से पिता के समान है | पर जब तुम कहते हो कि तुम्हारे पिता के समान है, तब फिर ये मानने को तैयार रहो कि सबके पिता के समान है | वो हम मान नहीं पाते ना? हमें तो ऐसा पिता चाहिए जो खास तौर पर हमारा पिता हो, एक व्यक्तिगत किस्म का पिता | हमें तो हमारे ही पिता से अरूचि हो जाएगी, जो हमारा जैविक (बायोलॉजिकल) पिता है, उसी से अरूचि हो जाएगी अगर हमें पता लगे कि उसके पन्द्रह-बीस बच्चे और हैं | हो जाएगी कि नहीं हो जाएगी? तुम्हें आज पता लग जाये कि तुम्हारे पिता के पन्द्रह-बीस बच्चे और हैं, तो तुम्हें बड़ी गहरी अरूचि हो जाएगी | तुम्हें तो एक विशिष्ट पिता चाहिए, जो बस तुम्हारा पिता हो | देखा है ना? घर में नया, छोटा बच्चा आता है, तो उसकी बड़ी बहन को बड़ी ईर्ष्या हो जाती है | क्यों? क्योंकि तुमको ऐसा पिता चाहिए जो एकमात्र तुम्हारा ही पिता है | ऐसा होता है आदमी का स्वभाव | स्वभाव कहना गलत होगा, आदत | ऐसी होती है हमारी प्रकृति | तो इसीलिए हमें हक नहीं है कि हम उसको पिता बोलें क्योंकि वो सृष्टि मात्र का पिता है, सिर्फ तुम्हारा नहीं |

-‘ज्ञान सेशन’ पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सेशन देखें: https://www.youtube. com/watch?v=fw1XjqUCh6w