अब लगन लगी की करिए – बुल्ले शाह

अब लगन लगी किह करिये,

नाहं जी सकिये नांह ते मरिये | टेक |

 

तुम सुनो हमारे बैना,

मोहि रात दिने नहीं चैना,

हुण पी बिन पलक न सरिये |

 

इह अगन बिरोंह दी जारी,

कोई हमरी तपत निवारी,

बिन दरसन कैसे तरिये?

 

बुल्ल्हा पई मुसीबत भारी,

कोई करो हमारी कारी,

एह अज्जर कैसे जरिये?

 

श्रोता(जिनका नाम जयदीप है): सर, हम यहाँ बोध शिविर में हैं। क्या यहाँ भी ऐसा तो नहीं कि हम एक दूसरे की अलग तरह की बात का समर्थन कर रहे हैं?

वक्ता: तुम यहाँ पर आये थे, तुमने यहाँ गाना गया, प्रेजेंटेशन दी। मान लो ये सारे लोग जो यहाँ बैठे थे, तुमसे कहते कि ये तुम जो गा रहे हो ये बेवकूफी की बात है और तुमने जो इसका अर्थ किया, वो और बेवकूफी का है, तुम कह रहे हो कि हम यहाँ भी यही कर रहे हैं कि एक दूसरे की अनुमति लेने की कोशिश कर रहे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं हो रहा, यही शक है ना?

श्रोता(जिनका नाम जयदीप है): जी।

वक्ता: तो तुम यहाँ आते हो, ये लोग यहाँ बैठे हैं, ये लोग अपनी अनुमति नहीं देते हैं और तुम हिल जाते हो। तो वहां पर इस वक़्त जयदीप खड़ा है और यहाँ ये सारे लोग बैठे हैं और सभी ने सुनने से मना कर दिया है कि ये तुम क्या वाहियात बातें लेकर आ गए हो, इनका तो कोई मतलब नहीं है, इनका तो कोई अर्थ नहीं है। जिस हद तक जयदीप को फर्क पड़ता है उस हद तक ये बातें फिज़ूल ही गयीं, उस हद तक ये बातें क्या, ये पूरा कैंप ही फिजूल गया। ये बात संयोग है कि यहाँ इक्कीस लोग हैं। जो असली घटना घट रही है वो आतंरिक है, उसका समाज से लेना-देना नहीं है। सत्य सामाजिक नहीं होता, हम पहले भी कह चुके हैं।

तो अगर तुम हिल जाते हो इन लोगों के कहने से और जिस हद तक, थोड़ा अगर तुम में शक पैदा होता है, तो जितना शक पैदा हुआ है समझ लेना कि उतना रास्ता बाकि है। और जिस हद तक तुम कहते हो कि तुम नहीं भी मानो तो कोई बात नहीं, सत्य जनतंत्र तो नहीं है कि वोटिंग कराएं कि इक्कीस में से ग्यारह लोग जिधर होंगे वो पक्ष जीत गया। वो बात तो नहीं है यहाँ पर। अगर इक्कीस के इक्कीस लोग इनके गाने पर सहमती दे रहे हैं, बात से हामी भर रहे हैं, तो ये संयोग है, शुभ संयोग है कि एक बात सबको दिखाई दे रही है, पर है संयोग ही, और ये संयोग अगर नहीं भी घटे तो कोई फर्क नहीं पड़ गया। अच्छी बात है कि सभी को बात समझ में आ गयी। सभी को बात समझ में नहीं आई, दो या तीन या पांच को समझ में आई, उन दो-तीन-पांच के लिए बहुत अच्छा है।

मान लो मैं कभी यहाँ पर आऊं और सिर्फ एक के साथ आऊं तो उसको तो हामी भरने वाला कोई भी नहीं होगा। और पीछे जाओ, एक दिन ऐसा होता है कि जयदीप कहता है कि अकेले ही आऊंगा, अब जयदीप किस से मान्यता मांगेगा। यहाँ बैठा है, अभिषेक ने कहा बन्दर को देखो, बिल्ली को देखो, ठीक है। उनको देखा और अचानक बल्ब जल गया। ऐसा ही होता है, अब तुम किस से पूछने जाओगे कि जो पता चला वो ठीक है या गलत है?

श्रोता(जिनका नाम जयदीप है): किसी से नहीं।

वक्ता: ये बात एक संयोग है कि इक्कीस लोग मौजूद हैं और कह रहे हैं कि ठीक। ये लोग नहीं भी कहें तो क्या होता है? कह रहे हैं बड़ा अच्छा लग रहा है, पर नहीं भी कहते तो कुछ बिगड़ नहीं जाना था। और ये तुमने सीखना होगा कि अपने आप में इतना गहरा आश्वासन रहे, उसी आश्वासन का नाम ‘श्रद्धा’ है। कि इक्कीस क्या, इक्कीस हज़ार लोग भी विरोध में खड़े हों तो तुम कांपने न लग जाओ। और इक्कीस हज़ार लोग समर्थन कर रहे हों, ये भी इस बात की गारंटी न बन जाए कि तुम ठीक हो। तो यहाँ ऐसा नहीं है कि हम आपस में एक दूसरे के साथ खिचड़ी पका रहे हैं कि मैं गाना गाने आऊं तो तुम ताली बजाओ, जब तुम आओगे तो मैं बजा दूंगा। हम म्यूच्यूअल एड्मिरेशन में नहीं हैं, अगर हम किसी को एडमायर कर रहे हैं तो सच को एडमायर कर रहे हैं, एक दूसरे को नहीं।

श्रोता २: इन्होंने एक बात बड़ी अच्छी कही कि दर्द का होना ही सूचक है कि दर्द ख़त्म होगा।

वक्ता: कौन सा दर्द? विरह का। और कोई दर्द नहीं। सिर्फ वही वाला, विरह का दर्द ।

-बुल्ले शाह की काफ़ी की व्याख्या पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

देखें:https://www.youtube.com/watch?v=hKdH-G6axk8&list=UUkuZJIhMYCnOa0dnWeHuN2w