यह तो प्रार्थना नहीं

प्रश्न: क्या प्रार्थना से मन बदल सकता है?

वक्ता: हाँ, ज़िन्दगी को पूरी समग्रता में जीने से जिसमे शोर ना हो। देखो, प्रार्थना का मतलब उसके सामने दिन में सिर्फ पांच बार घुटने टेकना नहीं है। दिन में पांच लाख बार उसके सामने घुटने टेकने होंगे। और लोगों को पांच बार करना भी बहुत बड़ी बात लगती है। आज के युग के बच्चों को देखो। वह दिन में पांच बार प्रार्थना नहीं कर पाते। कोई एक बार कर ले तो बहुत बड़ी बात हो जाती है। प्रार्थना वह नहीं है जिसे एक बार, पांच बार या दस बार किया जाए। आपको धार्मिक होना पड़ेगा दिन के हर पल में।

और प्रार्थना क्या है? क्या प्रार्थना एक विशेष जगह जाने का नाम है? क्या प्रार्थना एक विशेष आसन में बैठना है कि एक वक़्त होगा, एक आवाज़ आएगी और मैं एक विशेष मुद्रा में आकर प्रार्थना करूँगा? क्या इसका नाम प्रार्थना है?

समझें इसे। प्रार्थना सीमित सेल्फ का समर्पण है असीमित के सामने। प्रार्थना जो सबसे महान लेन-देन संभव है, वह है। प्रार्थना में आप सीमित का समर्पण करते हैं और असीमित पाते हैं। प्रार्थना में आप अपने अहंकार का विसर्जन करते हैं। मैं अपना अहंकार तुमको दे रहा हूँ। और वह देते ही मैं तुम्हारे जैसा हो गया। मैं तुममें समर्पित हो गया। यह छोटा-सा अहंकार देकर मुझे इतना सारा मिल गया। यह है प्रार्थना। ईगो से छुटकारा पाना प्रार्थना है। क्या अहंकार कभी चाहेगा कि वह मर जाए?

सभी श्रोता: नहीं।

वक्ता: जब भी ईगो यह देखेगी कि उसके नष्ट होने की नौबत आ रही है, वह क्या करेगी? वह तुरंत हाथ-पाँव चलाएगी। वह तुम्हें और परेशान करना चाहेगी ताकि वह जिंदा रह सके। इसी लिए प्रार्थना में, मेडिटेशन में लोगों को बड़ी दिक्कत आती है। मन में विचार उठते हैं। अनावश्यक कामनाएँ उठने लगती हैं। कई लोगों को शरीर में कुछ होने लगता है। क्योंकि अहंकार मरना नहीं चाहता। प्रार्थना में तुम्हारे अहंकार को मरना होगा। वो जो सीमित है ना, अहंकार, उसे मरना होता है। वो जो है विराट, उसके सामने सीमित समर्पित हो जाता है। ‘मैं समर्पण कर रहा हूँ। पूरी तरीके से’। पर ये जो सीमित है यह मरना नहीं चाहता तो इसलिए यह तुमको विचलित करता है। क्योंकि इसे अच्छे से पता है कि विचलित होने में समर्पण नहीं हो सकता।

अब कैसे संभव है कि ईगो को नष्ट किया जा सके? यह जानकर कि वह अहंकार है। उस पल के लिए वह गयी। ईगो, ईगो है जब तक वह देखी ना जाए ईगो की तरह। जो नकली है उसको तुम तभी तक पकड़े रहते हो जब तक नहीं जानते कि नकली है। तुम साँप को तभी तक तो पकड़े रहोगे जब तक नहीं जानते कि यह साँप है। जिस क्षण तुम जान गए कि यह साँप है, तुम उसे छोड़ देते हो। अहंकार को तुम तब तक पकड़े रहते हो जब तक नहीं जानते कि यह मेरे लिए घातक है और नकली है। जैसे ही जान जाते हो कि क्या है, तुम उसे छोड़ देते हो। जब तुम जान जाओगे कि ईगो क्या है और किन-किन तरीकों से तुम्हारी ज़िन्दगी खराब करती है, तुम्हारे लिए बहुत आसान हो जाएगा ‘परम’ के सामने उस छोटी-सी ईगो को बस छोड़ देना। फिर तुम्हें दिक्कत नहीं आएगी और फिर प्रार्थना सिर्फ दरी पर बैठकर और मस्जिद में नहीं होगी। फिर उसके लिए किसी विशेष दिशा की ओर मुँह भी नहीं करना पड़ेगा। फिर हर पल प्रार्थना का होगा।

अहंकार ना होना अपने आप में प्रार्थना है। प्रार्थना में तुम क्या कहते हो? ‘भगवान् जी, मेरा यह काम कर दो’। अरे, भगवान् जी करें कैसे? तुम खुद लगे हुए हो अपना काम करने में। तुम जगह छोड़ो तो वह आकर तुम्हारा काम करें। भगवान् जी कर देंगे काम। पर वह अपने तरीके से करेंगे। वह तरीका तुम्हारे छोटे से अहंकार को पसंद नहीं आएगा। वह तो काम कर देंगे। पर उनके काम करने का तरीका बड़ा विचित्र है, बड़ा पूर्ण है। खंडित तरीका नहीं है उनके काम करने का। अस्तित्व अपना काम कर देगा। तुम्हारी पुकार सुनी जाएगी। पर क्योंकि अस्तित्व  पूर्ण है, उसके काम करने का तरीका भी पूर्ण है। और तुम्हारी मांग है सीमित। तुम क्या मांग करते हो? कि मुझे यहाँ से वहाँ पहुँचा दो। और अस्तित्व अच्छे से जानता है कि तुम यहाँ से वहाँ तब तक नहीं पहुँच सकते जब तक तुम्हारे पास एक गाड़ी ना पहुँच जाए। तुम इतनी सी मांग करोगे और अस्तित्व पूर्णता से प्रतिक्रिया करेगा और गाड़ी भेजेगा। और तुम कहोगे, ‘मैंने ये तो माँगा ही नहीं था। मैंने तो बस यह माँगा था कि यहाँ से वहां पहुँच जाऊँ। मेरी प्रार्थना नहीं सुनी गयी। माँगा कुछ था और मिला कुछ और’।

तुम्हें असीमित की प्रतिक्रिया करने के लिए जगह बनानी पड़ेगी। और वह जगह तभी बन सकती है जब तुम इस तुच्छ अहंकार से परे हो जाओ। पर तुम हर तेरीके के काम करते हो। तुम प्लानिंग करना कहते हो। कहते हैं, ‘भगवान् उनकी मदद करता है जो अपनी मदद करते हैं’। बिल्कुल पागलपन की बात है। ‘भगवान् उनकी मदद करता है जो अपनी मदद नहीं करते’। तुम अपनी मदद करने के लिए इतने आतुर हो कि वह तुम्हारी मदद कैसे  करे?

तुम योजनाएँ बनाते हो, तरकीबें बनाते हो, जुगत भिड़ाते हो! ‘मैं ऐसा कर जाऊँगा! मैं वैसा कर जाऊँगा! मैं! मैं! मैं! मैं इन्शुरन्स खरीद लूँगा, मौत को मात दे दूँगा। तुम थोड़ा इस करने से बाज आओ तो वह भी कुछ करे। इतना एक्टर होना बंद करो। इतना कर्ता होना बंद करो। अहंकार सिर्फ कर्ताभाव में ही पनप सकता है। मैं यह कर रहा हूँ, मैं वह कर रहा हूँ।

होने दो। प्रवाह के साथ बहो। बहने का मतलब अकर्मण्यता नहीं है। बहने का मतलब आलसी होकर बैठना नहीं है।

बहने में ज़बरदस्त कारवाई होती है। पर वह अहंकार की नहीं होती। तुम काम करना बंद नहीं कर दोगे। काम होते रहेंगे। पर वह अहंकार का कर्म नहीं होगा। वह तुम्हारे स्वभाव के कर्म होंगे। वह होते रहेंगे। ऐसी ज़िन्दगी जियो जो शांति में हो! जो अभय में हो! वह अपने आप में एक प्रार्थना से पूर्ण ज़िन्दगी है। समाज में इसका विपरीत होता है। तुम्हें पता है मंदिरों में सबसे ज्यादा कौन जाते हैं? जो सबसे बड़े महापापी हैं। वह अपने पाप धोने के लिए पहुँच जाते हैं। या जो परम बेवकूफ हैं वह पहुँच जाते हैं। तुम कभी जाओ, देखो वहां कैसे लोग होते हैं। जितने लोगों की थोड़ी सी बुद्धि जगी है उन्होंने धर्म से किनारा कर लिया है। वह ना प्रार्थना करते हैं, ना मंदिर जाते हैं। वह सब नास्तिक बने जा रहे हैं। अमेरिका का बहुत बड़ा हिस्सा या तो नास्तिक हो गया है या अनीश्वरवादी हो गया है।

इस तरीके से जब प्रार्थना की जाएगी, बिना समझ की प्रार्थना, या पाप धोने के लिए प्रार्थना की जाएगी, यह तो पूरा-पूरा अहंकार का ही रूप है। यह प्रार्थना नहीं है। इसको प्रार्थना मत मान लेना। प्रार्थना में कोई इच्छा नहीं रखी जाती। तुम्हारी कामनाओं की पूर्ती के लिए नहीं होती है प्रार्थना। प्रार्थना तभी हो सकती है जब कामनाएँ ना हों। कामना का क्या मतलब है? कि तुम अपनी छोटी सी ईगो पकड़े हुए हो। प्रार्थना बिल्कुल विपरीत है। प्रार्थना में तुम कहते हो, ‘कोई कामना है ही नहीं’। पर हम तो प्रार्थना करते ही किसी उद्देश्य के लिए हैं। और घूस तक देने को तैयार रहते हैं। सत्तर प्रतिशत अंक आ गए, दो किलो लड्डू। और नहीं आये, ‘तो तुम देख लेना, लड्डू नहीं दूँगा’।

यह प्रार्थना है? सिर्फ प्रार्थना मत करिए। प्रार्थना से भरी ज़िन्दगी जीए। तुम ऐसा नहीं कर सकते कि दिन-भर गड़बड़ कर रहे हो और जाओगे और बैठोगे और ध्यान केन्द्रित हो जाएगा। ऐसा संभव नहीं है। यह मन के खिलाफ है। पूरी ज़िन्दगी जियो, प्रार्थना से भरी।

-‘संवाद पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।
संवाद देखें: https://www.youtube.com/watch?v=jF8Jzctp3OQ