निर्णयों के लिए दूसरों पर निर्भर क्यों?

श्रोता: सवाल है कि ‘क्यों हम अपने निर्णय स्वयं नहीं ले पाते और इस कारण दूसरों पर आश्रित रहते हैं?’

वक्ता: कितने लोग ऐसे हैं जिनकी यही कहानी है कि अपने निर्णयों के लिए दूसरोँ पर आश्रित रहना पड़ता है? हाथ खड़े करें।

(सभी श्रोतागण हाथ खड़े करते हैं)

ये हम सब की कहानी है। अब जो कहूंगा वो ध्यान से सुनना क्योंकि वो कोई रटी-रटाई बात नहीं होगी जो तुमने बहुत बार सुन रखी हो। जब तक तुम्हें निर्णय लेने पड़ रहे हैं, तब तक तुम्हें दूसरोँ पर आश्रित होना ही पड़ेगा। जब तक तुम्हें निर्णय लेने पड़ रहे हैं, तुम्हें दूसरों का सहारा लेना ही पड़ेगा। निर्णय का अर्थ है, ‘बहुत सारे विकल्प हैं’। निर्णय तभी लेते हो जब कई विकल्प हों?Slide2

श्रोता: जी सर।

वक्ता: निर्णय का अर्थ ही है कि उन विकल्पों में से मुझे सूझ नहीं रहा है, कि मेरे लिए उचित क्या है और मैं फँस गया हूँ। कई राहें खुल रहीं हैं
और उन राहों में से मुझे किधर चलना है मैं जान नहीं पा रहा। अब मुझे आवश्यकता पड़ रही है निर्णय लेने की। जहाँ कहीं भी निर्णय लेने की आवश्यकता है, वहाँ पर एक ऐसा निर्णय-कर्ता खड़ा हुआ है जो कहेगा कि अब मुझे निर्णय लेना है। भई, अगर डिसिशन मेकिंग होनी है तो डिसिशन मेकर भी होगा ना? अब तुम मुझे बताओ कि ये जो निर्णयता है, ये कौन है?

श्रोता: मन।

वक्ता:बहुत बढ़िया। मन किसका?

श्रोता: मेरा।

वक्ता: बहुत बढ़िया। अब इतनी तहकीकात भी कर ली है, अब मुझे ये बताओ कि ये जिसे तुम अपना मन बोल रहे हो, ये कैसे बनता है? कहाँ से आता है?

श्रोता: अतीत से।

वक्ता: अतीत से आता है। हमारा जो मन है वो या तो दूसरों से आता है- दूसरे जो अलग व्यक्ति या वस्तुएँ हैं या विचार हैं बाहर के- या हमारे अतीत से आता है। मन टाइम और स्पेस है। टाइम का अर्थ हुआ अतीत। तो मन या तो अपने ही अतीत को दोहराता रहता है, या स्पेस में जो दूसरे व्यक्ति हैं उनसे कुछ – कुछ लेता रहता है। मन में मेरा कुछ होता ही नहीं। ये बात बहुत दूर तक जाती है, इसको अच्छे से समझ लेना। जिसको तुम कहते हो ‘मेरा मन’, इस मेरे मन में सही बात तो ये है कि ‘मेरा’ कुछ होता ही नहीं है। मेरे मन में सिर्फ दूसरों के और अतीत के प्रभाव भरे हुए हैं। ये मन क्या है? एक भीड़ है जिसमें दूसरे बैठे हुए हैं या ‘मैं’ भी बैठा हुआ हूँ, तो मेरा अतीत बैठा हुआ है। ये मन जब निर्णय करेगा, तो निर्णय वास्तव में कौन कर रहा है?

श्रोता १: मैं।

वक्ता: मन में दूसरे बैठे हुए हैं। मन में कौन बैठे हैं?

श्रोता २: दूसरे।

वक्ता: तुम्हारे मन ने निर्णय किया, मतलब किसने निर्णय किया?

सभी श्रोता: दूसरों ने।

वक्ता: यानि जब भी तुम निर्णय कर रहे हो, तो निर्णय कौन कर रहा है?

श्रोता: दूसरे।

वक्ता: क्योंकि निर्णय कहाँ से निकल रहा है?

श्रोता: मन से।

वक्ता: और मन में कौन है?

सभी श्रोता: दूसरे।

वक्ता: जब भी निर्णय होगा, वो निर्णय करने वाले दूसरे ही होंगे। भ्रम हमें ये हो जाता है कि ये हमने निर्णय लिया है। और यही नहीं होता, हम बड़े अहंकार के साथ खड़े हो जाते है कि ये ‘मेरा निर्णय है’ और इस पर कायम रहूँगा। कायम रहो अगर तुम्हारा हो। तुम्हारा है ही नहीं तो तुम्हारे कायम रहने का क्या मोल।

श्रोता: पर निर्णय तो मेरा ही है।

वक्ता: जिसे तुम अपना कहते हो ‘मेरा’, हम उसी की तो बात कर रहे हैं। जिसे तुम ‘मेरा मन’ कहते हो वो मन ही दूसरों का है। ये एक बहुत महत्वपूर्ण सवाल है जो हर एक जवान आदमी को अपने आप से पूछना चाहिए।

मेरे मन में ‘मैं’ कितना हूँ? शुद्ध ‘मैं’। कोई घपलेबाज़ी नहीं, मिलावट नहीं, विशुद्ध ‘मैं’। ‘मेरे मन’ में जितनी तहकीकात करोगे, पाओगे ‘मेरे’ मन में ‘मैं’ नहीं हूँ, मेरे अलावा पूरी दुनिया है। चाचा, ताऊ, दुनिया भर के धर्म-ग्रन्थ, शिक्षा, टीवी, मीडिया, अख़बार, पॉलिटिक्स, सब कुछ है, ‘मैं’ ही नहीं हूँ। अपनी आवाज़ को ध्यान से सुनोगे तो पाओगे कि पता नहीं कितने लोगों  की आवाज़ है, पूरी भीड़ की  आवाज़ है उसमें, बस तुम्हारी ही आवाज़ नहीं है। तो ऐसे में तुम जो निर्णय करोगे भी वो तुम्हारा होता कहाँ है? तुम देखो हम निर्णय कैसे करते हैं। अब तुम्हारी एक खास उम्र है इसलिए बताताहूँ – शादी करने का निर्णय। कुछ ही सालों में तुम भी वहाँ पर खड़े होंगे। अब जैसे-जैसे दुनिया कनेक्टेड होती जा रही है वैसे-वैसे शादी होती है इंटरनेट पोर्टल्स के माध्यम से। तुम वहाँ पर जाते हो और तुम से पहले ही पूरा फॉर्म भरवा लेते हैं जिसमें सवाल पूछते हैं: तुम्हें कैसा लड़का चाहिए? और तुम सब कुछ भरते हो – कैसा घर हो, क्या जात हो, क्या गोत्र हो, कितनी लम्बाई हो, कितनी शैक्षिक योग्यता हो, कितना कमाता हो, किस धर्म का हो, कहाँ बसा हुआ हो, संयुक्त परिवार में रहता हो या नुक्लेअर फॅमिली में – ये सारी बातें पहले ही बता देते हो। पहले ये बताओ, किस धर्म में पैदा हुए हो क्या ये निर्णय तुम्हारा था?

सभी श्रोता: नहीं।

वक्ता: और जिस धर्म में तुम पैदा हुए उसी धर्म का तुम्हें पति या पत्नी चाहिए, तो पति और पत्नी भी जिन आधारों पर चुन रहे हो क्या वो निर्णय तुम्हारे हुए? क्या तुमने अपना गोत्र चुना था? तो अपनी पत्नी भी तुम कहाँ चुन रहे हो?

जिसने तुम्हारा गोत्र तुम्हें दिया, वही तुम्हारी पत्नी भी तुम्हें दे रहा है। तुममें से कितने लोगों ने चुना था कि मैं इसी पुण्य-भूमि में एक क्षत्रिय बनकर पैदा होऊँगा? पर आज तुम्हारे सारे निर्णय इसी पर आधारित हैं कि मैं एक भारतीय हूँ और मैं फलाने धर्म का हूँ। तो जिसको तुम अपना निर्णय बोलते हो, वो तो बाहरी ही होगा। तुमने बहुत अच्छा किया कि तुमने इस बात को पकड़ लिया कि मैं आश्रित हूँ। पर हम में से आधे से ज्यादा अपनी पूरी ज़िन्दगी बिता देते हैं ये सोचते हुए कि वे अपने निर्णय खुद लेते हैं। और उन्हें बड़ा गर्व रहता है कि मेरे जैसे बनना। ‘हमने हमेशा अपने निर्णय खुद लिए’। उन्हें पता भी नहीं है कि वो कितने आश्रित थे। तो तुम बहुत सही जगह पर खड़े हो, तुम्हें कम से कम दिख तो रहा है कि मैं आश्रित हूँ। ज़्यादातर लोगों को तो दिखता ही नहीं कि मैं आश्रित हूँ। क्या अब तक की पूरी बातचीत का इसका ये अर्थ है कि हमारी किस्मत ही है दूसरों पर निर्भर रहना? क्या मैंने तुमसे ये कहा? अभी तक की बात सुन कर शायद तुमको शक हो सकता है कि मैं ये कह रहा हूँ कि आदमी की विडम्बना ही ये है कि उसका जीवन बैसाखियों पर गुज़ारा जायेगा और उसके सारे निर्णय कभी भी उसके होंगे ही नहीं। नहीं मैं ये नहीं कह रहा हूँ। मैं कह रहा हूँ कि जब तक निर्णय रहेगा तब तक आश्रित रहोगे। तुम निर्णय को ख़त्म ही क्यों नहीं कर देते। जहाँ कहीं ये ‘निर्णय’ है, वहीँ तुम्हारी निर्बलता है। जहाँ निर्णय ख़त्म हुआ, वहीं तुम्हारी निर्बलता भी ख़त्म हुई। निर्णय ख़त्म करने का तरीका क्या है? ये भी मैं तुम्हें बताता हूँ, बड़ा मज़ा आएगा। निर्णय हमेशा थोड़ा समय लेता है क्योंकि निर्णय मन करता है और मन समय लगाता है विचार करने में। कभी बहुत सारा समय लगा देता है, कई लोग सालों लगा देते हैं और कई लोग २-४ सेकंड में ही निर्णय कर लेते हैं। पर समय ज़रूर लगेगा, याद रखना। तुम समय लो ही मत। तुम तो तत्काल में जियो। उदाहरण देता हूँ; उदाहरण भी नहीं प्रयोग करके दिखता हूँ। अभी मुझे सुन रहे हो, तो क्या निर्णय कर के सुन रहे हो?

सभी श्रोता: नहीं सर।

वक्ता: बस ऐसे ही जियो। उपस्थिति पूरी है, पर निर्णय नहीं है। ना निर्णय है, न निर्णय करने वाला है। तुम हो, मन नहीं है। तुम हो पूरे तरीके से, मन नहीं है। मन में वो पूरी गठरी है – विचार की, अतीत की, दूसरों की – वो तुम वहीं छोड़ आये, वो गायब ही हो गयी। तुम्हारी यहाँ पूरी उपस्थिति है फिर भी देखो अपने चेहरों को। काश कि तुम्हारे चेहरे भी उपस्थित हो सकते। तुम अभी पूरी तरह मौजूद हो अभी और वो मन जो है ही बंधा हुआ, जोहै ही गुलाम, वो मन अभी है ही नहीं। और जिसका मन अभी यहाँ पर है, वो यहाँ है ही नहीं।

तुमको कंप्यूटर का सॉफ्टवेयर लिखना बहुत पसंद है, इस पसंद का तुम निर्णय नहीं ले सकते। ये पसंद एक तरीके का प्रेम है, ये अपने आप होता है,ये अनिर्णयात होता है। उसके बाद ये निर्णय नहीं करना पड़ता कि मैं कंप्यूटर साइंस में इंजीनियरिंग करुँगी या नहीं। अब ये ज़ाहिर सी बात है कि मुझे सॉफ्टवेयर लिखने से प्रेम है, मुझे आनंद आता है, तो मुझे निर्णय कहाँ लेना पड़ा कि मुझे इंजीनियरिंग करनी है या नहीं। अब तो करनी ही है और कोई रास्ता कहाँ है और फिर अगर और कोई रास्ता है, तो वो दबाव का रास्ता है। दूसरे मुझे बाध्य कर रहे होंगे, नहीं तो पहले ही तुम्हें प्रेम हो जाता। प्रेम में कोई निर्णय नहीं होता, हाँ शादी में निर्णय होता है। या प्रेम भी निर्णय लेकर करते हो?

श्रोता: क्या रुचि और प्रेम एक हैं?

Slide1वक्ता: इंटरेस्ट यानि रुचि और प्रेम दो बहुत अलग बातें हैं। हम प्रेम नहीं जानते, हम रुचि जानते हैं। रुचियाँ तो बाहर से ही आती हैं। तुम भारत में ही पैदा हुए हो, क्या सम्भावना है कि तुम्हारी आइस हॉकी में रुचि होगी और क्या सम्भावना है कि तुम्हारी क्रिकेट में रुचि होगी? यहाँ बैठो हो तुम सब,९०% की रुचि क्रिकेट में होगी। ये रुचि तुम्हारा चुनाव है या सिर्फ परिस्थितियों ने तुम्हें दे दी है। भारत में पैदा हुए हो तो क्रिकेट में रुचि होगी ही। क्या क्रिकेट में रुचि होती यदि ब्राज़ील में पैदा होते तो? अगर ब्राज़ील में पैदा होते तो…?

श्रोता: फुटबॉल में रुचि होती।

वक्ता: मैं रुचियों कि बात नहीं कर रहा हूँ, मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि अगर डॉक्टर के घर पैदा हुए और बचपन से ही मरीज़ो को देखा, तो डॉक्टरी में रुचि हो गयी। मैं उसकी बात नहीं कर रहा हूँ। मैं किसी बहुत आगे की बात कर रहा हूँ।

तो निर्णय जितने कम लो उतना अच्छा है। हम निर्णय इसलिए लेते हैं क्योंकि  हमें बचपन से बताया गया है ही जितना सोच विचार करो उतना अच्छा है। बिना विचारे जो करे सो पाछे पछताए। तो हमें उसमें बड़ी सुरक्षा की भावना आती है कि पछताना न पड़े, कोई चूक न हो जाये। देखिये अब इस बात को बस इतना समझ लीजिये कि कहने वाले ने दस और बातें भी कहीं, जो अभी हमें बतायी ही नहीं गईं, हमें बस थोड़ी सी बात बता दी गयी क्योंकि जिसने बतायी वो खुद असुरक्षित अनुभव करते थे, खुद सुरक्षा के पीछे दौड़ने वाले लोग थे। तो उन्होंने तुम्हें भी एक ऐसा मंत्र दे दिया जिसे तुम दोहराए जा रहे हो कि खूब सोचो, खूब विचारो, फिर निर्णय करो।

अब मैं तुमसे एक दूसरी बात कह रहा हूँ कि जीवन में जो कुछ बहुत महत्वपूर्ण है, वहां निर्णय करो ही मत। वह तो बस होने दो, उसमें डूब जाओ और फिर जो भी घटना घटती है उसको घटने दो। डूब जाओ, उस में तुम्हें सुरक्षा नहीं मिलेगी। उसमें तुम्हारा मन जो है वो डरेगा, पर मन को डरने दो, मन तो है ही डरपोक, तुम डरपोक नहीं हो। मन तो है ही डरपोक, मन को डरने दो। मन को बस उसी सुरक्षा की तलाश है, तुम थोड़ा असुरक्षा में भी जीना सीखो।

श्रोता: सर, डर से नेगेटिविटी आती है।

वक्ता: डर से नेगेटिव विचार नहीं आता, डरना अपने आप में ही एक विचार है। और जैसे अभी थोड़ी देर पहले कहा था कि, ‘अच्छी आदत और बुरीआदत’ वैसे उसको नकरात्मक और सकरात्मक का लेबल मत लगाओ। डर अपने आप में ही एक विचार है, वो विचार के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं। डर जो है, वो विचार के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं। और डर को जब तुम समझ गए … एक प्रयोग करो। हम सब अपने मन में पता नहीं क्या-क्या भर के बैठे रहते हैं और हम सब ऐसे ही हैं, तुम भी, मैं भी। इसी क्षण बैठे-बैठे तुम जो बुरे से बुरा अपना सबसे खतरनाक ख्याल रखते हो, आँख बंद कर उसकी कल्पना करो। और ये कल्पना तुम जानते हो किसलिए कर रहे हो, ठीक है न? हम एक प्रयोग कर रहे हैं, जानते-बूझते। दो मिनट उसकी कल्पना करो, फिर देखो मन कैसा खट्टा हो जाता है। तुम सिर्फ कल्पना कर रहे हो, पर मन ऐसा दहल जाएगा। विचार भर है डर और उस विचार को तुम कैसे भी उठा दो, मन की हालत ख़राब हो जाती है।

श्रोता: क्या यह सिर्फ एक विचार है?

वक्ता: हाँ, बिल्कुल सही बात है। एक बार विचार किया और वो विचार कट भी ऐसे ही जाता है- जब तुम जान जाते को कि विचार ही तो है। एकमिनट प्रयोग करो, मन को खट्टा हो जाने दो, फिर मन से बोलो, “सूत न कपास, जुलाहे से लट्ठम लट्ठा”। कुछ है ही नहीं, डर है। कुछ है ही नहीं, डर है। जो तुम्हारी सबसे घातक, वीभत्स कल्पना है उसको तुमने एक बार उठने दिया नहीं कि सब जानते पूछते मन सहम जायेगा – बेरोज़गारी, किसी प्रियजन कि मृत्यु- कुछ भी और मन ऐसा हो जायेगा कि पूछो मत और तुमे उसी से पूछोगे, ‘तू कितना पगला है रे, मैं प्रयोग कर रहा हूँ और तू तब भी डर गया’। वो कहेगा – ‘मैं ऐसे ही हूँ, मेरी तो फितरत ही ऐसी है, मैं क्या करूँ?’ ‘मैं विचारो मैं ही जीता हूँ’’, ‘तुमने क्यों उत्तेजित किया विचार?’ ‘तुमने एक बार विचार उठा दिया, मैं तो गया’ और तुम कहोगे, ‘तू विचारों में जीता है, मैं नहीं जीता’। ‘तुझे डरना है तो डर, मैं नहीं डरूँगा’।

– ‘संवाद’ पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

संवाद देखें: Prashant Tripathi:निर्णयों के लिए दूसरों पर निर्भर क्यों?(Why do I depend on others for decisions?)

 

इस विषय पर अधिक स्पष्टता के लिए पढ़ें:-

लेख १ :हमारे निर्णय मुर्दा प्रतिक्रियाएं  
लेख २ :निर्भरता का बोध मुक्ति की ताकत 
लेख ३ :गुलामी है अपनी छवि के लिए दूसरों पर निर्भरता