साहसी मन समस्या को नहीं, स्वयं को सुलझाता है

प्रश्न: Should we face an uncomfortable situation and be done with it or is it better to avoid it? Both the cases require a lot of energy. (किसी अप्रिय स्थिति का सामना करें या उससे बच कर ही रहें? दोनों ही विकल्प बड़ी ऊर्जा मांगते हैं)

वक्ता: देखो, अंत तो सामना करने से ही होगा। प्रश्न ये नहीं है कि मैं क्या करूँ? प्रश्न ये है कि मैं किस लायक हूँ? अंत तो सामना करके ही होगा इस स्थिति का। सामना करने का अर्थ है स्थिति से आँखें चार करना। स्थिति को उसकी पूर्णता में देखना। दूध का दूध, पानी का पानी। और स्थिति को उसकी पूर्णता में देखने का मतलब है- हो क्या रहा है, दिख क्या रहा है, नाम क्या दिया जा रहा है, अर्थ क्या बनाये जा रहे हैं? सब कुछ। भाव क्या उठ रहे हैं? सब। पूरा। तो ये तो होगा, इसके बिना कुछ गलता नहीं है, गाँठ पूरी की पूरी बनी रहती है। पर ये होगा, ऐसा कोई आदर्श मात्र तो नहीं हो सकता। ऐसा होने कि एक शर्त होती है कि तुममें ऐसा कर पाने की काबिलियत हो। और जब काबिलियत होती है तो तुम ये सवाल उठाते नहीं हो कि सामना करूँ या पड़ा रहने दूं। तो ये सवाल अभी भी मत उठाओ। तुम बस अपने आपको तैयार करो। फिर एक स्थिति हो या पचास स्थितियाँ हों, तरह-तरह कि स्थितियाँ हों, तुम पाओगे कि तुम खुद ही उनका सामना कर लेते हो। ये प्रश्न ही नहीं उठता है। अगर सामना उचित प्रकार से कर ही सकते तो तुम ये सवाल पूछते नहीं। ये सवाल ही बता रहा है कि कहीं न कहीं अटके हुए हो, गाँठ है। अंततः तो सामना ही करना है। वो सामना अगर इसी पल हो जाए तो बहुत बढ़िया, पर इस पल होगा नहीं जब तक तुमने अपने मन को तैयार किया नहीं। मन को ऐसा तैयार करो के वो हर स्थिति को देख ले। पूरा देख ले, पार देख ले। और फिर कहीं से भागेगा नहीं वो। वो सामना ही करता है। सामना ही करता है, कुछ पड़ा नहीं रहने देता, कुछ नहीं पड़ा रहने देता।

तुम तैयार करो, साफ़ रखो। उसके बाद एक अद्भुत घटना और भी घट सकती है। वो ये कि तुम्हें किसी परिस्थति को हल करना ही न पड़े। तुम्हारी आहट भर से परिस्थिति खुद हल हो जाए। तुम्हारे आसपास समस्याएं, माया फटके ही ना। नज़र तुम्हारी ऐसी हो कि देखने भर से जितना भ्रम है सब घुल जाए। तुम जहाँ बैठे हो, अपने आप उस कमरे का माहौल ऐसा हो जाए कि तुच्छ बात हो ही नहीं सकती। तुम जिस घर में हो, उस घर की तबियत बदल जाए। वो सब अपने आप होने लगेगा। तुम्हें बहुत श्रम नहीं करना पड़ेगा कि मैं समस्या का उन्मूलन करने के लिए आ गया। कहा था न मैंने? कि कहते हैं उपनिषद कि जो ब्रह्म को जानता है, वो ही नहीं तरता उसका पूरा कुल तर जाता है। अब घर, समाज ये तुम्हारे सामने चैलेंज नहीं खड़ा कर पाएंगे। ये तर गए। ऐसा प्रवाह है तुम्हारा कि तुम्हारे साथ साथ ये भी बह गए। और वही परीक्षा भी है। क्योंकि अकेले बैठ कर अपनेआप को ये शाबाशी दे लेना कि मैंने पा लिया, मैं पार हो गया, बहुत आसान है। तुममें कितना दम है इसकी पहचान तो सम्बन्धों में ही होती है, अकेले बैठ कर नहीं। निकलो, सम्बंधित हो, और फिर पूछो अपने आप से कि कहाँ गयी वो सारी स्पष्टता? कहाँ गया वो सारा साहस? कहाँ गया वो जो अभय सीखा था? कहाँ गयी वो जो शान्ति पायी थी? कोने में बैठ कर के जो मैं अपने आपको दिलासा देता था कि पा गए शान्ति-  आता हूँ बाहर, और घुसता हूँ घर में और सारी शान्ति डगमगा जाती है। सब कांपने लगता है। तो इसका अर्थ यही कि अभी थोडा और वर्जिश करो। अभी ज़रुरत है।

क्लासरूम में तो बड़ा बढ़िया है। गुरु की एक प्रकार कि सत्ता होती है छात्रों के ऊपर। तो उनको तो पढ़ा दिया पाठ  ‘लव इज़ नॉट पज़ेशन, नॉट डिज़ायर, नॉट फीलिंग…’, और घर गए और वहाँ भी प्रेम से सम्बंधित कोई काण्ड चल रहा है- वहाँ सब भुला गया, गुरुता गयी हेराय। कौन गुरु कौन चेला! वहाँ तुम भी कुंडली बांच रहे हो बैठ कर। वहाँ तुम भी वही नोन, तेल, लकड़ी कर रहे हो। तो फिर अभी दिल्ली दूर है।

कितना जाना है, कितना पाया है, उसकी परीक्षा तो ऐसे ही होती है। पता है कि ऑटो वाले को पचास रुपए ही लेने चाहिए और वो कह रहा है अस्सी, तब क्या होता है? पता है कि सामने झूठ  बोल रहा है पर ये भी पता है कि बड़ा नुकसान कर सकता है मेरा, तब क्या होता है? तब पता चलेगा कि कितना आत्मबल है। अन्यथा- मात्र प्रवंचना, आत्म-प्रवंचना। बड़े आध्यात्मिक सिंह हैं और बीवी के सामने मूस। और सिंह से मूस तक कि यात्रा एक पल में हो जाती है। ये तुम्हारी असली हैसियत है। बड़े ज़ोर से गर्जना उठती है इनकी। छात्र बैठे हों सामने, और लोग बैठे हों, और अभी पिताजी सामने आ कर बैठ जाएँ तो… मरियल बकरी भी शर्मा जाए ऐसी इनकी मिमियाहट। ये है असली। लिखवा लो कुछ, अभी लिखेंगे, दो पन्ना लिख कर भेज देंगे, तुम बताओ कितना लिखना है? चार हज़ार शब्द? और किस पर लिख रहे हैं? प्रेम पर लिख रहे हैं!

सम्बन्ध हैं ये सारे अपने आप से, दूसरों से। देखिये, सत्य और संसार दो नहीं होते। जो सत्य जानता है, वो संसार में भी सूरमा होता है। जो सत्य में जीता है, वो संसार में भी सिंह होता है। कबीर अक्सर कहते थे, कबीर इन तीनों को एक साथ ही बोलते थे-  साधु, सिंह, सूरमा, शायर – ये सारे नाम एक साथ लेते हैं वो। और ये सब कौन हैं? ये सब वही हैं जो सत्य में जीते हैं। जो सत्य में जीता है वो सड़क पर  कैसे मिमिया सकता है? जो सत्य में जीता है, वो शयन कक्ष में कैसे मिमिया सकता है? जो सत्य में जीता है, वो समस्या से भाग कैसे सकता है? वो तो सूरमा है। वो समस्या को काटता नहीं, समस्या उसे देख के भाग जाती है। तो ये न पूछो कि हम करें क्या? ये पूछो कि मैं हूँ कौन? आस्था क्या है मन की ? किस रूप में जानता हूँ अपने आपको? जैसे तुम हॊगॆ, जीवन को वैसे ही उत्तर दोगे तुम। सत्य के अलावा कहीं और से आ सकता है साहस? कोई और स्रोत हो सकता है साहस का क्या? मैं पूछ रहा हूँ आपसे, जवाब दीजिये?

श्रोता: कुछ परिस्थितियों में तो हो सकता है।

वक्ता: जैसे?

श्रोता: मतलब जैसे कोई अपने ही मोहल्ले में ही रहा है बचपन से ले कर जवानी तक, उसे पता है मेरी पहचान है काफी, तो अपने मोहल्ले में तो वो हो सकता है…

वक्ता: ये साहस नहीं कहलाता। ये साहस उन्हीं समस्याओं के सन्दर्भ में है,जिनको हमने कहा कि डमी समस्याएं हैं। तो डमी समस्याओं को कैसा साहस चाहिए?

श्रोता: डमी साहस।

वक्ता: डमी साहस। अब डमी समस्या क्या है? मैं लड़की को छेड़ रहा था, उसका भाई आ गया, वो मुझे डांट रहा है, तो मैंने डमी साहस क्या दिखाया? मैं इसी मोहल्ले में रहा हूँ तो मैं तीन-चार लड़कों को बुला लूँगा। बड़ा साहस दिखाया। और समस्या इस से सुलझ भी गयी। भाग गया लड़की का भाई।

श्रोता: और जितनी बार हल होगी, उतनी और…

वक्ता: अरे पर ये समस्या थी ही किस स्तर की? ये क्या असली समस्या थी? ये कौन सी वाली समस्या थी?

सभी श्रोता: डमी।

वक्ता: पर फिर वही बात है न, जब नकली साहस नकली स्रोतों से उपलब्ध हो जाता है तो असली साहस कि इच्छा कौन करे? अब मैडम ने कर दी है गलती और तीन-चार लोग डांट रहे हैं सड़क पर – कि क्या कर दिया ये आपने। मैडम को भी पता है गलती हो गयी है और डांट सुन रही हैं। तभी मैडम के पतिदेव आ गये, अब मैडम सिंहनी बन गयी हैं – ‘मेरी कहाँ गलती थी?’ पता है पति पीछे खड़ा है, अब पति लड़ेगा। बड़ा साहस आ गया इनमें। अब इनका मुँह देखो तो लगेगा कि अब ये बड़ी साहसी हैं। ये कौन सा साहस है? अभी पति निकल जाए, ये फिर चुहिया बन जाएंगी। या अभी वो झटका दे दे इनको कि ‘गलती तो तुम्हारी ही थी न’, तो फिर इनकी हालत देखना, ऐसे आँख दिखाएंगी| ये कौन सा साहस है?

एक साहस होता है जिसका कारण होता है। और एक दूसरा साहस होता है जिसका कोई कारण नहीं होता। जीवन जीना है तो उस साहस में जिया जाए जो अकारण है।

आपको नहीं पता कि आपको डर क्यों नहीं लगता? आपको नहीं पता कि इस दुर्दशा में भी आप मुस्कुरा क्यों रहे हो? और तब समझिये कि मन डूबा हुआ है उसके प्रेम में। वही है स्रोत, वहीँ से आता है असली साहस, और कहीं से नहीं आ सकता। मात्र धार्मिक मन ही लड़ सकता है। ये तो हम सब जानते ही हैं कि मात्र धार्मिक मन ही प्रेम में उतर सकता है, मैं आपसे कह रहा हूँ कि मात्र धार्मिक मन ही युद्ध कर सकता है। जो ये कपटी मन है,ये न प्रेम कर सकता है न खड्ग उठा सकता है। इससे कुछ नहीं होगा। न ये प्रेम कर पायेगा, न ये तलवार उठा पायेगा। क्योंकि दोनों पूरे तरीके से साहस के काम हैं।

धर्म महाप्रेम भी है और धर्म महायुद्ध भी है। और जो सोचते हों कि युद्ध नहीं करना है वो कृपा करके प्रेम की भी अभीप्सा न करें। उपलब्ध नहीं होगा उनको प्रेम। जो संघर्षों से बचते हों -और संघर्षों से बचेगा कौन? कौन चाहेगा बचना? जिसमें आत्मबल की कमी होगी। अन्यथा कौन भागता है संघर्षों से- आओ, हम तैयार खड़े हैं। जीवन द्वैत है और द्वैत का अर्थ ही है संघर्ष। हम जीवन के लिए पूरी तरह प्रस्तुत हैं, आओ। हमारी सांस-सांस यलगार है, आओ। हमें तो लड़ना ही नहीं है। हम तो हमेशा जीत में खड़े हैं। हम हमेशा सत्य में खड़े हैं, और सत्यमेव जयते। उसके अलावा और जीता कौन है आजतक? तो हम हार कहाँ से सकते हैं? कौन सी चुनौती है, लाओ। ये होता है अकारण साहस। आप उसका कोई कारण नहीं पाएंगे। कोई आ कर आपसे पूछेगा- अकड़ किस बात पर रहे हो इतना? आप कहोगे- पहली बात तो हम अकड़ ही नहीं रहे, दूसरी बात कोई बात ही नहीं है। न अकड़ है,न अकड़ का कारण है। एक शांत, स्थिर, गंभीर साहस है जो चिल्लाता नहीं है, जो मौन बैठा है, जो अपने ही बल में मौन बैठा है, जिसको प्रदर्शित करने की आवश्यकता भी नहीं है। जो किसी शांत ज्वालामुखी कि तरह है, कि जब मौका आये तो बस अपना तांडव भर दिखा देता है अन्यथा चुप। तुम उस ज्वालामुखी पर खेल सकते हो। जाओ पिकनिक मनाओ। वो कुछ नहीं कहेगा। छोटे-छोटे बच्चे वहाँ पर जाकर के कंचे खेलें। कुछ नहीं कहेगा ज्वालामुखी। वो किसी को एहसास भी नहीं दिलाएगा के मेरे भीतर क्या भरा है? भरा है, पर वो शांत, मौन, स्थिर। उसे चिल्लाने कि जरुरत नहीं है। और ये नहीं कि वो एकबार उलीच देता है तो उसके बाद कुछ मर्म ही शेष नहीं बचता। उसका जो स्रोत है वो धरती का गर्भ है। वहाँ से मिलती है उसे अपनी आग। और वो कभी ठंडी नहीं होगी। वो अक्षय है, वो कभी ख़त्म नहीं हो सकती। जितना दिखेगी उतना ही शेष भी रहेगी। या जैसे कोई झरना बहता जा रहा है, बहता जा रहा है पर ख़त्म ही नहीं हो रहा है क्योंकि पानी आ रहा है एक अक्षय स्रोत से। ऐसा ही साहस है। अक्षय स्रोत, अकारण। या, अगर कहना ही हो तो कहिये महाकारण। या तो कहिये अकारण- कि उसका कोई कारण है ही नहीं ,या कहिये कि उसके पीछे जो है वो कारणों का कारण है। वो महाकारण है। परम कारण है। वो ऐसा कारण है के हमारी पकड़ में ही न आये, इतना बड़ा कारण है। महद कारण, वृहद कारण, दिव्य कारण। बड़ा मज़ा आएगा।

साहस के उन क्षणों के बाद जब चुनौती अपने आपको पेश करती है, आप अपने आप से पूछोगे-  मुझे डर क्यों नहीं लगा? और बड़ा मज़ा आएगा। आप कहोगे कि ये मौका तो पूरा ऐसा था कि मुझे डर जाना चाहिए था। बात तर्कयुक्त है- उस समय भी नहीं डरे? पागल हो क्या? जान जा सकती थी, सम्बन्ध टूट सकते थे। तुम डरे क्यों नहीं? तुम कहोगे यार बात तो सही है पर अब जब नहीं लगा डर तो क्या ज़बरदस्ती डरें? ऐसा ही है। जो मस्त होता है, उसको अपनी खुमारी तो रहती ही है और उसका एक मज़ा ये भी होता है कि दूसरे उसको कैसे-कैसे तो देखते हैं। जैसे आप किसी फाइव स्टार होटल में पहुँच जाएँ बड़े साधारण कपडे पहन के। फ़क़ीर कोई घुस रहा हो और लोग देख रहे हैं। तो उसको अपनी मौज की तो खुमारी है ही, और दूसरों की हालत भी हंसी दिला रही है-  ‘देख कैसे रहे हैं मुझे’। दूसरे जब उसे देखेंगे तो उन्हें हंसी नहीं आएगी, बल्कि उनके भीतर दहशत पैदा होती है कि हमारे रुपए पैसे की कोई कीमत ही नहीं? यहाँ ऐसे-ऐसे लोग आने लगे, जैसे शिवपुरी का प्रोग्राम बने और आपको पता लगे कि वहाँ बारिश हो रही है और आप कहें कि ये क्या एकदम ही पागल हैं, इतनी ठण्ड में जा रहे हैं। तुम हमें पागल समझ रहे हो? हमें आपको देख के मज़ा आ रहा है कि ये हमें कैसे कैसे देख रहे हैं।

अभी गए थे एक जगह तो रात को बारह बजे, कुंदन एंड पार्टी, ठण्ड का मौसम, अभी कुछ दिन पहले की बात है। पानी में कूद गए। जब कूद गए पानी में तो एक तो दृश्य ये था कि ये कैसे दिख रहे हैं -और ये मौज में थे – और दूसरा दृश्य ये था कि जो इनको देख रहे हैं वो कैसे दिख रहे हैं| वो दहशत में थे कि ये क्या एकदम ही पागल हैं? दिसंबर-जनवरी की ठण्ड में पानी में कूद गए? डबल मज़ा। इस दुनिया का भी, उस दुनिया का भी। जो आपके भीतर परम बैठा है, उसका तो मज़ा लें  ही, स्रोत से तो आ ही रही है अविच्छिन्न धारा, और आँखों से भी जो धारा आ रही है उसके भी मज़े ले रहे हो। आँखों से भी जो संसार दिख रहा है उसके भी मज़े ले रहे हो कि ये देखो, इनकी शक्लें देखो। हम अपने सागर में तो डूबे ही हुए हैं, वहाँ जो सुख है वो तो मिल ही रहा है, और तुम्हारी शक्ल जो चुटकुले जैसी बनी हुई है उसका भी मज़ा मिल रहा है हमको।

श्रोता: सर, इसमें जो द्रष्टा एक हो जाता है,दृश्य ,दृष्टि और द्रष्टा उसके बाद जो सीन है जो आपकी आँखों से चल रहा है उसको आप अलग कैसे देख सकते हैं?

वक्ता: दिखता एक ही है। एक में करके देखते हो। समझ लीजिये कि मैं यहाँ बैठा हूँ, अब मुझे एक तो मज़ा मिल रहा है बैठने का, बड़ा मज़ेदार है| ये सत्य है, मैं सत्य में बैठा हुआ हूँ। सत्य में बैठा हूँ, सत्य में सांस ले रहा हूँ, सत्य में पी रहा हूँ , तो एक तो मज़ा उसका। और दूसरा ये कि धवन जी कैसी कैसी बातें कर रहे हैं उसका मज़ा आ रहा है। तो दिख एक ही रहा है, दूसरा तो होने  का मज़ा है। उसमें प्रतिष्ठित हैं, बैठे हुए हैं उसमें।

एक बात पक्का समझ लो कि जीवन की कोई समस्या सोच -सोच कर नहीं सुलझती। वो उस क्षण सुलझ जाती है जिस क्षण वो मन सुलझ जाता है जिसमें वो समस्या है। ये बात ध्यान रहेगी? जीवन की कोई समस्या सोच-सोच नहीं सुलझती। समस्या एक मन है, जिस क्षण वो मन सुलझ गया जो समस्याग्रस्त है उसी क्षण वो समस्या भी घुल गयी। मन जैसा है वैसा ही रहे और समस्या तिरोहित हो जाए, ये नहीं हो सकता। मन ही समस्या है और मन को ही सुलझना होगा। समस्या नहीं सुलझती, मन सुलझता है। समस्याओं पर बहुत गौर मत करना कभी इसीलिए। मन पर गौर करना। कभी नहीं सुलझा पाओगे समस्या को। गाँठ मन में है, मन ही सुलझेगा।

 -स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

देखें: https://www.youtube.com/watch?v=XybVcAqPAbg