माहौल से प्रभावित क्यों हो जाता हूँ?

प्रश्नसर, हमारा व्यवहार इस पूरे वातावरण से प्रभावित क्यों हो जाता है?

वक्ता: ऐसा इसलिए है क्योंकि यही सीखा है तुमने, यही तुम्हारी पूरी व्यवस्था है देखो ये स्वभाविक है कि एक बच्चे के साथ ऐसा हो। एक बच्चे के साथ हो तो ये होना लाज़मी है, ये होकर रहेगा, इसको रोका नहीं जा सकता क्योंकि बच्चे का मस्तिष्क अभी विकसित ही नहीं हुआ है। उतनी समझ ही नहीं आई है उसमें कि अभी वो जागरूक हो सके। एक बच्चे के साथ ऐसा होगा और अच्छा है ऐसा हो, कि उसे बाहर से ही प्रभावित होना पड़े, क्योंकि आप एक बच्चे के विवेक पर ये नहीं छोड़ सकते कि ये जो बिजली का सर्किट है, इसमें उंगली डालनी है या नहीं। अगर वो प्रयोग करके सीखेगा, तो शायद शारीरिक रूप से बचेगा ही नहीं।

तो अच्छा है कि बच्चे के ऊपर बाहरी प्रभाव रहे, कोई रहे उसके पीछे जो आ कर उसकी उंगली खीँच ले या कोई बोल दे, तुम उसे कुछ समझा नहीं पाओगे। उसे ये नहीं समझा पाओगे कि तुम्हारा शरीर एक पोलर कंडक्टर है, और शरीर को बिजली छुएगी तो मर जाओगे। ये सब आप उसे समझा नहीं पाओगे। तो आपको उस बच्चे को प्रभावित करना ही पड़ेगा।

ध्यान से देखो, समझ जाना और प्रभावित होना, दो विपरीत बातें हैं। तुम्हें कुछ समझ में आ गया, भले ही उसकी शुरुआत बाहर से हुई हो, तो वो तुम्हारा अपना हो जाता है।dbzb दूसरी ओर अगर तुम प्रभावित हो रहे हो, तो वो बाहरी ही रहेगा, तुम्हारे मन में रहेगा लेकिन बाहरी ही रहेगा। एक बच्चे का प्रभावित होना स्वाभाविक है आठ साल, दस साल, बारह साल की उम्र तक, पर दिक्कत ये है कि तुम अभी तक बारह साल की उम्र के ही रह गए हो।

प्रौढ़ता, व्यस्कता तुममें आ ही नहीं रही है। एक अच्छे घर में, एक अच्छी शिक्षा व्यवस्था में, एक उम्र के बाद सारे प्रभाव वापस खींच लिए जाते हैं और कहा जाता है बच्चे से कि अब अपने सामर्थ्य पर जीना सीखो, अपनी टांगों से चलना सीखो, अपनी आँखों से देखना सीखो। ये बता दिया जाता है कि ‘जो कुछ भी बताया गया था अभी तक, वो इसलिए बताया गया था क्योंकि वो तुम्हारे लिए आवश्यक था, अब हम कुछ नहीं बोलना चाहते। दुनिया उपलब्ध है तुम्हारे लिए, सारी जानकारी उपलब्ध है, पर समझना तुम्हें अपने ही विवेक से पड़ेगा। दुर्भाग्य हमारे साथ ये रहा है कि ये घटना हमारे साथ कभी घटी ही नहीं।

हमें निर्भर तो बनाया गया पर आत्मनिर्भर कभी नहीं बनाया गया।

निर्भरता आवश्यक थी बचपन में, पर फिर दूसरा कदम भी लेना चाहिए था कि अब हम तुम्हें सारी निर्भरता से मुक्त करते हैं। ये मुक्त करना एक धीरे चलने वाली प्रक्रिया होती है, ऐसा नहीं कि एक दिन में ही तुम मुक्त हो जाओगे। पर हम में से अधिकांश के जीवन में ये प्रक्रिया कभी हुई ही नहीं। हम इस कैमरे की तरह हैं, कि जो कुछ ये सुनता जा रहा है, वो सब कुछ रिकॉर्ड हो रहा है इसकी स्मृति में, पर समझ इसे कुछ नहीं आ रहा। रट इसने सब कुछ लिया है, ये टॉपर बनेगा यूनिवर्सिटी का, पर इसे समझ कुछ नहीं आ रहा है। अगर परीक्षा आ जाये तो सौ में से सौ अंक आएंगे इसके, कुछ भी नहीं छोड़ा है इसने, सब रट लिया है। ऐसा ही है जीवन हमारा।

बाहरी प्रभाव हम पर काम करते रहते हैं और हम उन्हें सोखते रहते हैं, पर अपनी समझ कहीं नहीं है। अपनी समझ जब भी लाते हैं तो होता ये है कि समाज, शिक्षा, घर-परिवार हमें निर-उत्साहित करते हैं। फिर अगर बारह साल तक आदत लगी हो सहारों पर चलने की, तो शुरु में थोड़ा डर तो लगता है जब आत्मनिर्भर होते हो। तब तुम्हें चाहिए होता है कि कोई तुम्हें सहारा दे दे, कोई बस पीछे से इतना कह दे कि डरो नहीं, कुछ नहीं होगा, ऐसा सबके साथ होता है।

फिर एक उम्र आती है जब तुम्हें अकेला होना ही पड़ता है। तुम्हें आज तक ऐसा कोई मिला ही नहीं जो कहे कि चलो, नहीं गिरोगे, अपने कदम अब खुद उठाओ, चलना सीखो। ऐसे किसी का मिलना बहुत ज़रूरी होता है। पर अभी-भी समय बीत नहीं गया है, कुछ खो नहीं गया है, अभी भी पूरी उम्र पड़ी है तुम्हारे सामने।

अब जाग जाओ।

– ‘संवाद’ पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

संवाद देखें: माहौल से प्रभावित क्यों हो जाता हूँ?

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