ख़ुशी

  • हम सब रस-भोगी हैं। सतही मन के लिए रस प्रसन्नता की उत्तेजना है और आत्मा से जुड़े मन के लिए रस आनन्द की शान्ति है।”

 

  • “दूसरे को ख़ुशी तभी दे पाओगी, जब ख़ुद खुश हो।”

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उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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