हिंसा

  • मूल भी तुम, फूल भी तुम, आत्मा भी तुम, जीव भी तुम| यही ज्ञान है, यही प्रेम है और यही आहिंसा है| ज्ञान जब गहरा होता है, तब प्रेम बन जाता है |”

 

  • संसार का अर्थ ही है, क्लेश, हिंसा, टुकड़े-टुकड़े, और निरंतर द्वन्द की स्थिति। धारणाओं को, मन को बचाने की लड़ाई जिसने लड़ी है वो पूर्णपराजित होगा।”

 

  • हम वादे निभाने में जितने हिन्सक होते हैं, जितनी नफ़रत होती है उतनी अन्यथा कभी नहीं होती।”

 

  • “आज अगर आदमी प्रकृति के प्रति इतना हिंसक है, पेड़पौधों के प्रति इतना हिंसक है, जानवरों के प्रति इतना हिंसक है, तो उसकी वजह ये है कि वो अपने शरीर के प्रति भी बहुत हिंसक है।”

 

  • “तुम अगर क्रूर हो गए तो तुम्हारा मन सिर्फ एक प्राणी के प्रति क्रूर नहीं रहेगा| जो आदमी जानवर के प्रति क्रूर है वो अपने बच्चे के प्रति भी क्रूर रहेगा, वो अपने परिवार के प्रति, पूरी दुनिया के प्रति क्रूरता से ही भरा रहेगा।”

 

  • “आमतौर पर जब हम किसी को कड़वा बोलना चाह रहे होते हैं, जब मन बिलिकुल लालायित हो रहा होता है किसी पर वार करने को, तो इसीलिए नहीं लालायित हो रहा होता है कि उसे सामने वाले की बढ़ोतरी चाहिए, मन इसीलिए लालायित हो रहा होता है क्योंकि उसे अपनी भड़ास निकालनी है| उसे अपनी हिंसा का प्रदर्शन करना है| वो इतना भरा बैठा है की उसे अपना गुबार निकलना है , फट पड़ना है |” 

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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