आकाश का देवता नहीं, माटी का महात्मा || आचार्य प्रशांत, महात्मा गाँधी पर (2019)

आकाश से नहीं उतरे थे।

ज़मीन से उठे थे।

उनकी बात में देवपुष्पों की मादक सुगंध नहीं, गाँव की मिट्टी का सोंधापन था।

मनुष्य से महात्मा तक की श्रमसाध्य व लम्बी यात्रा की थी।

ठीक कहते थे: उनका जीवन ही उनका सन्देश है। जो उनके लिए संभव हो पाया, सबके लिए संभव है।

जब कोई अपने अतीत, अपनी वृत्तियों, और अपनी सीमाओं को चुनौती देता हुआ श्रद्धापूर्वक आगे बढ़ता है, तब उसकी उपस्थिति पूरे जगत में एक अपूर्व चेतना का संचार करती है।

लड़का-लड़की के खेल में जवानी की बर्बादी || आचार्य प्रशांत (2019)

कोई नहीं अपनी जवानी के पाँच साल ख़राब करे, अगर उसके पीछे लोग न हों जो उसको बैठाकर खिला न रहे हों।

हिम्मत ही नहीं पड़ेगी।

ये बात न प्रेम की है, न भावनाओं की है, न प्रतियोगी परीक्षा में असफलता की है। बात सीधी-सीधी ये है कि अधिकाँश ऐसे मामलों में पीछे माँ-बाप बैठे होते हैं, जो लड़के को घर में बैठाकर आसरा देने तैयार होते हैं।

पढ़ाई के किसी विषय में रुचि न हो तो? || आचार्य प्रशांत (2019)

इंटरेस्ट या रुचि छोटी चीज़ होती है, सत्यता बड़ी चीज़ होती है।

अहंकार कहता है, “रुचि को प्रधानता दो।”

अध्यात्म कहता है, “धर्म प्रधान है।”

अध्यात्म का अर्थ ही है – रुचि की परवाह ही न करना, और उस तरफ़ चलना जिस तरफ़ धर्म है, जिधर सत्य है।

दूसरों की गलती कितनी बर्दाश्त करें? || आचार्य प्रशांत (2018)

जिस चीज़ को तुम अपने में मूल्य देते हो, उसी चीज़ को तो तुम दूसरे में मूल्य दोगे न।

तुम्हें लगता है कि दूसरों को बुरा लग जाएगा अगर तुमने दोष निकाला, क्योंकि तुम्हें बुरा लग जाता है जब तुममें कोई दोष निकाला जाता है।

तुम ऐसे हो जाओ कि तुम्हें कुछ बुरा ही नहीं लगता, तो फ़िर तुम्हें ये भी बुरा नहीं लगेगा कि दूसरों को बुरा लगा।

शारीरिक आकर्षण इतना प्रबल क्यों? || आचार्य प्रशांत (2018)

स्त्री की देह पुरुष की देह माँगेगी, पुरुष की देह स्त्री की देह माँगेगी।

देख नहीं रहे हो कैसे प्लग और सॉकेट की तरह निर्माण है इन अंगों का।

वहाँ तो सबकुछ बनाया ही ऐसी तरह से गया है, कि एक चीज़ दूसरे की माँग करेगी ही।

तो बस वही खेल तुम खेल रहे हो।

स्त्री-पुरुष के मध्य आकर्षण का कारण || आचार्य प्रशांत (2019)

ये दो अलग-अलग केंद्र होते हैं काम करने के।

तुम प्रकृति के चलाए भी चल सकते हो, और बोध के चलाए भी चल सकते हो।

प्रकृति के चलाए चलोगे तो  महापाप होगा, उसकी सज़ा मिलती ही मिलती है।

बोध के चलाए चलोगे तो मुक्ति पाओगे, जो जीवन का परम लक्ष्य है।

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