स्वप्न

  • सपना जितना सुन्दर होता है, उतना उससे उठना मुश्किल।”

 

  • इंसान का मन हमेशा ऐसी सामग्री की तलाश में रहता हैं जिसमें उसके भयों और सपनों को आश्रय मिल सके।”

 

  • तुमने जिधर को भी कदम बढ़ाया है, उसी की ओर बढ़ाया है- कभी जान के, और कभी अनजाने में। मंज़िलें चाहे कुछ भी हों, रास्ते चाहे कहीं भी ले जाते हों, पर उसके अलावा तुम कभी किसी ओर बढ़े ही नहीं। वही तुम्हारी पहली और आख़िरी तलब है, वही तुम्हारे सपनों का सबब है, वही तुम्हारे आंसुओं की पुकार है, वही तुम्हारी बेचैनी और करार है। कभी जान के, कभी अनजाने में।”

 

  • “जब रस होता है सपने में, तो तुम सपनों को बुलाते हो।”

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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