स्रोत

  • सिखाने वाला एक है, माध्यम हज़ार।”

 

  • महत्वपूर्ण है महत्वपूर्ण को याद रखना।”

 

  • जो स्रोत में नहीं डूबा, वही समय से अपेक्षा रखता है।”

 

  • कीमत उस शब्दकोश की नहीं जहाँ से शब्द रहे हैं, कीमत उस स्रोत की है जहाँ से इन शब्दों को समझने की ताक़त मिली है।”

 

  • जो सत्य को समर्पित है वो संसार से कैसे भाग सकता है? संसार उतना ही पूजनीय जितना उसका स्रोत |”

 

  • जिस हद तक स्रोत से दूरी है, उतना ही आपके मिटने की संभावना है ।”

 

  • “ये दुनिया भी उसी स्रोत से आई है, जिस स्रोत से तुम आए हो|”

 

  • “तुम अपने केंद्र तक पहुँचना, जहाँ ध्यान है, वहाँ असली आज़ादी है। असली आज़ादी वहाँ है और वह आज़ादी ना विचार की आज़ादी है, ना शरीर की आज़ादी है।”

 

  • “ये दुनिया भी उसी स्रोत से आई है, जिस स्रोत से तुम आए हो| अगर तुम भले हो तो दुनिया बुरी कैसे हो सकती है| या तुम्हारा और दुनिया का उद्गम अलग-अलग है? अलग-अलग है क्या? कि “दुनिया तो गन्दी जगह है पर तुम बड़े साफ़ हो”? ऐसा है क्या? दोनों एक ही हो, तुममें और दुनिया में कोई अंतर नहीं है| तो डरते किससे हो?

 

  • “केंद्र की ओर जो भी क़दम उठाओगे, वो अगले क़दम का पथ प्रशस्त करेगा। और केंद्र से विपरीत जो भी क़दम उठाओगे, वो केंद्र की ओर लौटना और मुश्किल बनाएगा।”

 

  • “जब भी लगे कि आप किसी केंद्र से बंधे हुए हैं, समझ जाना कि नकली केंद्र है क्यूँकी असली केंद्र कोई होता नहीं।”

 

  • “तुम्हे मंत्र का कुछ पता नहीं क्या है, क्यों है लेकिन वो किसी ऐसे स्रोत से निकला है कि वो तुम्हारी प्यास बुझा देगा। तुम्हें पता भी नहीं होगा, उसने क्यों बुझा दी और कैसे बुझा दी पर वो तुम्हरी प्यास बुझा देगा।”

 

  • “मूल, उद्गम, स्त्रोत| मन को वहाँ जाना है| जहाँ से मन आया है, वहीँ पर वो शांत हो पाएगा| वहाँ पहुँच गए, वो लगने लग जाएगा|”

 

  • “उस जगह पर तब तक नहीं पहुँच सकते जब तक मन में तुमने ये धारणा डाल रखी है कि बाहर कुछ है जो पा लूंगा और बाहर कुछ है जिसमें मन लग सकता है| जब तक ये ख्याल तुमने पकड़ रखा है, तब तक स्त्रोत होते हुए भी तुमसे बहुत दूर रहेगा|”

 

  • “स्त्रोत पर होने का मतलब होता है – जो ऊँचे से ऊँची उपलब्धि हो सकती थी, वो हमने पा ली है| मन का जो आखिरी ठिकाना हो सकता था, वो मिला ही हुआ है| आखिरी लक्ष्य पा लिया है|”

 

  • “जो जा कर के स्त्रोत में बैठ जाता है, वो कहता है, “जहाँ पहुंचना था, वहाँ पहुँच ही गए हैं, पहुँचे ही हुए हैं, कम से ज़्यादा की तरफ नहीं जा रहे| जहाँ से जहाँ को भी जा रहे हैं, ज़्यादा से ज़्यादा को जा रहे हैं| हम जीतने में तो जीते हैं ही, हम हारने में भी जीते हुए हैं|””

 

  • “‘मन की ताकत तो मन की स्त्रोत से समीपता ही है’।”

 

  • “स्रोत का अर्थ वो, जो मन से भी पहले।”

——————————————————

उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

 

Leave a Reply