स्मरण

  • ये बिल्कुल झूठी बात है कि दुःख में इंसान भगवान को याद करता है। दुःख में क्या याद आता है? दुःख में हम सुख को याद करते हैं, सत्य को नहीं। दुःख का अर्थ ही है कि प्रस्तुत स्थिति की तुलना की जा रही है, किसी स्मृति या कल्पना से। दुःख में अगर सुख की याद आए, तो दुःख बचेगा ही कहाँ? हम दुःख में सुख का सुमिरन करते हैं, सत्य का नहीं।”

 

  • सुमिरन करने से दुःख ही नहीं छूटता, सुख-दुःख दोनो छूटते हैं। जब जाते हैं, तब दोनों एक साथ जाते हैं। मात्र सहजता बचती है।”

 

  • साधारण मन को रस अपने छोटे होने के डर में या बड़प्पन की लालसा में आता है। जो दास हो गया उसे तो बस कृष्ण के सुमिरन में ही रस आता है।”

 

  • “बुद्धि, तर्क और स्मृति, आपके ग़ुलाम होने चाहियें, मालिक नहीं।”

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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