स्त्री

  • जगत पदार्थ है, तो स्त्री वस्तु मात्र।” 

 

  • “स्त्री की तरफ भी आकर्षित इसलिए होते हो, बार बार दोहरा के बोल रहा हूँ, क्योंकि उसके माध्यम से कुछ ऐसा पा लेना चाहते हो जो कुछ आगे का है। वो, वो दे नहीं पाती, तो हताश हो जाते हो। जिस भी वस्तु की तरफ आकर्षित हो रहे हो, तुम्हें वो वस्तु नहीं चाहिए, उसके माध्यम से कुछ चाहिए। वो वस्तु, वो दे नहीं पाती, तुम्हें फिर निराशा मिलती है।”

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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