सुरति

  • एक ठीक रखो, सब ठीक रहेगा।”

 

  • महत्वपूर्ण है महत्वपूर्ण को याद रखना।”

 

  • संसार को ऐसे देखना है कि उसके स्त्रोत की सुरति सदा बनी रहे |”

 

  • स्मृति स्थूल होती है और सुरति सूक्ष्म |”

 

  • सुरति, स्मृति और निरति के बीच का पुल है | सुरति का आधार है मन, और निरति स्वयं अपना आधार है |”

 

  • संसार में जियो पर सुरति में |”

 

  • जो सुरति में है उसे संसार और आत्मा, दोनों उपलब्ध हो जाएँगे | संसार को लक्ष्य बनाना है, निरति को |”

 

  • ये बिल्कुल झूठी बात है कि दुःख में इंसान भगवान को याद करता है। दुःख में क्या याद आता है? दुःख में हम सुख को याद करते हैं, सत्य को नहीं। दुःख का अर्थ ही है कि प्रस्तुत स्थिति की तुलना की जा रही है, किसी स्मृति या कल्पना से। दुःख में अगर सुख की याद आए, तो दुःख बचेगा ही कहाँ? हम दुःख में सुख का सुमिरन करते हैं, सत्य का नहीं।”

 

  • सुमिरन करने से दुःख ही नहीं छूटता, सुख-दुःख दोनो छूटते हैं। जब जाते हैं, तब दोनों एक साथ जाते हैं। मात्र सहजता बचती है।”

 

  • साधारण मन को रस अपने छोटे होने के डर में या बड़प्पन की लालसा में आता है। जो दास हो गया उसे तो बस कृष्ण के सुमिरन में ही रस आता है।”

 

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उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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