सुरक्षा

  • जो मन को मारे वो वास्तविक धन है और जो मन की असुरक्षा से निकला हो वो नकली धन है।”

                   

  • मृत्यु के कष्ट की कल्पना मन की गहरी चाल है अपनी असुरक्षा को कायम रखने की। ऐसा मन जीवन बीमा कराएगा, मकान बनवाएगा।”

 

  • असुरक्षा के भाव से किये गए हर कर्म से हम ये उम्मीद करते हैं कि उससे सुरक्षा मिल जायेगी। बिना डर के तो हमें साँस लेना भी नहीं आता।”

 

  • डरो नहीं, तुम सुरक्षित हो।”

 

  • जब हम पूछते हैं, ‘समर्पण किसको?’ तो हम अपने अहंकार को सुरक्षित रखना चाहते हैं, उसका पता-ठिकाना याद रखना चाहते हैं, ताकि एक दिन उसे वापस ले सकें। समर्पण किसी को नहीं किया जाता। बस समर्पण किया जाता है।”

 

  • एक: मैं सुरक्षित नहीं हूँ। दो: मैं सुरक्षित हूँ। तीसरी: रक्षा का मुद्दा ही नहीं है, विचार ही नहीं है रक्षा का।”

 

  • सत्य, असत्य की रक्षा क्यों करेगा? होना, होने की रक्षा क्यों करेगा?”

 

  • सत्य सिर्फ अपनी रक्षा करता है क्योंकि उसके अलावा कुछ है ही नहीं। जो सत्य की गोद में नहीं हैं वही रक्षा की माँग करते हैं ।”

 

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उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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