सुख

  • हम वो हैं जो मूल और फूल को एक साथ नहीं देख सकते। सत्य और संसार को अलग-अलग देखना ऐसा ही है जैसे कोई फूल और मूल को अलग-अलग समझे। जैसे कोई एक वृक्ष को अपने खंडित मन से खंड-खंड देखे। यही तो निशानी है खंडित मन की: उसे सब अलग-अलग दिखाई देता है; वो सुख में दुख, और सुख-दुख में आनंद नहीं देख पाता। फूल, शूल और मूल सब अलग-अलग हैं उसके लिए। टुकड़े देखे तो संसार, पूरा देखा तो सत्य।”

 

  • ये बिल्कुल झूठी बात है कि दुःख में इंसान भगवान को याद करता है। दुःख में क्या याद आता है? दुःख में हम सुख को याद करते हैं, सत्य को नहीं। दुःख का अर्थ ही है कि प्रस्तुत स्थिति की तुलना की जा रही है, किसी स्मृति या कल्पना से। दुःख में अगर सुख की याद आए, तो दुःख बचेगा ही कहाँ? हम दुःख में सुख का सुमिरन करते हैं, सत्य का नहीं।”

 

  • मन जिधर को भागता है, उसी को वो खुशी मानता है। मन सुख की तरफ नहीं भागता है, बल्कि मन जिधर को भागे वहीँ उसका सुख है। मन किधर को भागेगा, वो संस्कारों पर निर्भर करेगा।”

 

  • जिसे सुख में सत्य याद गया, उसे दुःख भी तुरंत याद जाएगा। दुःख नहीं बचेगा और सुख भी नहीं बचेगा।”

 

  • “‘सदा सुखी रहो’ – यह श्राप है। मूढ़ ही ऐसा आशीर्वाद दे सकते हैं और कामांध ही ऐसा आशीर्वाद पा खुश हो सकते हैं। सुख तो एक अंतहीन दौड़ है, एक असंभव तलाश।”

 

  • सुख-दुःख समान हैं, इसका अर्थ यह नहीं है क़ि दोनों को अनुभव ही करो- ऐसा तो मुर्दा करता है। इसका अर्थ है यह जानना कि दोनों का मूल एक ही है। सुख में डूब कर सुखी हो और दुःख में डूब कर दुखी हो। सुख-दुःख का विरोध, अहंकार है। संत सुख और दुःख दोनों को गहराई से अनुभव करता है। तुमने जिसको गहराई से अनुभव कर लिया, तुम उससे अस्पर्शित हो जाओगे।”

 

  • सुख की उम्मीद का दूसरा नाम है, दुःख।”

 

  • दुखी कौन? जिसे सुख चाहिए।”

 

  • संसार से तुम्हें सुख मिल सकता है, आनंद नहीं। सुख नकली है, कल्पना है, विचार है। आनंद सत्य है, स्वभाव है।”

 

  • “~ सुख दुःख, आपदा संपदा, का अर्थ है, इन दोनों से गुज़र जाना। इनका विरोध नहीं करना।”

 

  • योगी कौन है? योगी वो है जो दुःख से पूरा गुज़रे, सुख से पूरा गुज़रे और दोनों से अछूता रह जाए।”

 

  • सुख का विरोध है, दुःख का विरोध है। सुख और माँगना, दुःख कम करने की मांग करना।”

 

  • “• सुख क्या है? मन को उसके संस्कारों के अनुरूप विषय मिल जाना।”

 

  • “• हम सुख भी भोगते हैं और दुख भी। हम निरंतर भोक्ता हैं।”

 

  • “• जब दुख आए तो जहाँ हो वहीं रहना। पीछे हटना। जब सुख आये तब भी जहाँ हो वहीँ रहना। आगे बढ़ना। आगे पीछे। सुख दुःख। तुम और तुम्हारा अचल आसन।”

 

  • “• अरे, इतना ही कहा था कि सुख से मत चिपको, ये कब कहा था कि दुःख से चिपक जाओ?”

 

  • गलत जगह ढूंढ रहे सुख को।”

 

  • “सारी चिंता, या सारी प्रसन्नता शुरू किस समय होती है? जब आँखों के सामने संसार आता है, और संसार का बड़ा हिस्सा है समाज, जो इंसान ने बनाया, ये पूरा मॉहौल। ये जैसे ही इन्द्रियों के माध्यम से मन में घुसता है, आक्रमण करता है वैसे ही चिंता शुरू, और इसका कोई उपचार नहीं है, क्योंकि इसकी परिभाषा ही यही है। अगर इसने मन को जकड़ लिया, तो चिंता होनी ही होनी है। तुमने आँख खोली और बाहर उपद्रव देखा, चिंता शुरू, क्योंकि उपद्रव सीधा आँखों से घुस कर के मन तक पहुँचा और मन को अपनी गिरफ्त में ले लिया। तुम कुछ कर नहीं पाओगे। तो ये तो बड़ी लाचारगी की हालत हो गयी, क्या करें? कुछ करा जा सकता है। करा ये जा सकता है कि तुम अपने आप को मन से ज़रा हटा लो, मन तो पकड़ में आ ही जाएगा संसार की क्योंकि मन बना ही संसार से है।”

 

  • “जैसा आपको संस्कारित किया जाता है उसी गति में बढ़ना आपका सुख है| और उससे यदि विपरीत तरफ़ आपको जाना पड़े तो उसका नाम दुःख है|”

 

  • “सुख कुछ नहीं है| तुम्हारे भीतर एक भाव आरोपित कर दिया जाता है कि देखो तुम में कोई अपूर्णता है, तुम उधर को चलो वहाँ पूर्णता मिल जाएगी, उस दिशा की ओर बढ़ते जाने का नाम सुख है|”

 

  • “सुख की ओर जो जितना भागा है उसे दुःख उतना इकट्ठा करना पड़ा है| बिना दुःख इक्कठा किए आपकी सुख की चाह को उर्जा मिल ही नहीं सकती, दुःख ही तो आपको उर्जा देता है सुख की ओर भागने की|”

 

  • “सुमिरन से दुःख ही नहीं जाता, सुख भी जाता है|”

 

  • “‘न सुख का विरोध है, न दुःख का विरोध है’।”

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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