साहस

  • जीवन में जो भी कचरा है, उससे निर्भय होकर गुज़रने के लिए, साहस और श्रद्धा दोनों चाहिए।”

 

  • परमात्मा से प्रेम लगना बड़े सौभाग्य की बात है। लेकिन ये सौभाग्य, चुनौती और खतरा दोनों लेकर आता है: जो पायेगा उसे गाना पड़ेगा। उसे अपने रोम-रोम से अपने प्रेम की उद्घोषणा करनी पड़ेगी। और जो ये हिम्मत नहीं दिखा पायेगा वो महापाप का भागी बनेगा। दोहरा जीवन जीना विश्वासघात है, परम सत्ता के प्रति।”

 

  • “हम में से ज़्यादातर लोग, अंधे नहीं हैं, सामर्थ्य सबके पास है, वो बोध सबके पास है। पर तुम आँख खोलने से डरते हो। क्योंकि जब भी तुमने आँख खोली है, उन क्षणों में तुमने यही पाया है, कि जो कुछ भी मैं अपना संसार जानता था, तमाम दुनिया, रिश्ते नाते, सपने, ये सब कितने बेहूदे हैं। तो इसलिए तुमने डर के मारे, आँखें दोबारा बंद कर रखी हैं। वरना जानते तो तुम सब हो।”

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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