साक्षी

  • कबीर, कबीर के अलावा कुछ नहीं कहते। कबीर होना माने साक्षी होना। तुम भी साक्षी हो जाओ।”

 

  • जो हो रहा है होने दो तुम इसमें अपना कर्ताभाव लाओ। बस जो हो रहा है उन सब के साक्षी मात्र बने रहो और उनसे पूरा गुज़र जाओ।”

 

  • अवलोकन आपके हाथ में है। साक्षित्व आपके हाथ में नहीं है। मन से मन को विचारो। मन ही मन का अवलोकन करता है। मन का उचित प्रयोग यही है: खुद को देखना, दृश्य और दृष्टा को एकसाथ देखना।”

 

  • साक्षित्व का अर्थ है कि सारे बदलावों के बीच में आप शांत हो।”

 

  • “आपका साक्षित्व उतना ही गहरा होगा जितना आपका मन साफ़ है।”

 

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उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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