शरीर

  • अस्ति है समाप्ति,शून्यता है अनंतता”
  • जो समय ने दिया है उस पर समय का प्रभाव होगा ही। शरीर समय है। शरीर चाह कर भी समय के पार नहीं जा सकता। और मन भी समय-संसार ने दिया है।”

 

  • जहाँ समय है, वहाँ कर्मफल है। शरीर और मन, दोनों पर कर्मफल का असर होता है। शरीर पर स्थूल रूप से दिखाई देता है और मन पर सूक्ष्म रूप से। इसमें कोई अपवाद संभव नहीं है। अतः शरीर और मन दोनों को कर्मफल भुगतना ही होगा।”

 

  • शरीर और आत्मा के मध्य सेतु है मन।”

 

  • अहम् भाव जब प्रकृति से जुड़ जाता है तो शरीर कहलाता है।”

 

  • हम शरीर और मन रूप में प्रतिक्षण बदल रहे हैं। इसलिए जो अभी है, वो अभी ही जीया जा सकता है। यही जीवन है।”

 

  • शरीर और मन समय में हैं। जहाँ समय है, वहाँ मृत्यु है।”

 

  • शरीर और मन में योग्यता ही नहीं है निकट जाने की।”

 

  • मन और शरीर सीमाएं हैं। इन सीमाओं का उपयोग करके कोई असीम नहीं हो सकता। प्रेम असीम है।”

 

  • शरीर और विचार प्रबंध हैं, सदा दूरी बनाए रखने के।”

 

  • किसी के भी जीवन में शरीर और विचारों से प्रवेश करना नीचता है| किसी के जीवन में आत्मा के राजपथ से प्रवेश करना उत्तम है |”

 

  • जब शरीर से तादात्म्य होता है तब हर भय मृत्यु का ही होता है। मृत्यु एक घटना नहीं है जो घटेगी इस शरीर के साथ। मृत्यु एक विचार है जो हर पल घट ही रहा है ।”

 

  • जीज़स का शरीर मर सकता है, जीज़स का सत्य, जीज़स का तत्व नहीं मर सकता है।”

 

  • आसक्ति का विरोध हो शरीर का नहीं। आसक्ति, विरक्ति।”

 

  • समय देह है। जब तक देहभाव रहता है, तब तक समय रहता है।”
  • “संतों का पशुओं के साथ सहज हो जाना, बस इतना ही दिखाता है कि वो अपने शरीर के साथ सहज हो गये हैं।”
  • “शरीर इसीलिए है ताकि शरीर से आगे जा सको।”
  •  आपका पूरा संसार आपके शरीर पर आधारित है, इस बात को ध्यान से समझिएगा, पूरा संसार हमारा हमारे शरीर से शुरू होता है। संसार और शरीर एक ही हैंदोनों पदार्थ।

 

  • “जो आदमी अपने शरीर को लेकर ही ओहापोह में रहता हो, वो कहीं से आध्यात्मिक नहीं हो सकता।”

 

  • “हम शरीर तक का तथ्य तो बर्दाश्त नहीं कर पाते, हम परम सत्य क्या बर्दाश्त करेंगे?”

 

  • “शरीर का अर्थ ही है कि इस पूरे खेल में अब तुम पात्र हो, अब तुम बच के नहीं भाग सकते।और बच के भागने का ख्याल यही बताता है कि तुम खेल को समझे ही नहीं।तुम उतनी ही बड़ी मूर्खता कर रहे हो, जितनी उस अभिनेता की होती है, जो नाटक के बीच से अपने पात्र, अपने चरित्र को छोड़ कर के भाग जाए।”

 

  • “शरीर क्या है? शरीर वो, जो संसार के होने का आभास कराए।”

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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