वास्तविकता

  • जो वास्तविक है, उसका कोई अनुभव नहीं हो सकता।”

 

  • गरीब रह पाना बहुत अमीरों का काम है। गरीब होता तो गरीब थोड़े ही होता। तुम्हारे पास जब प्रभु नहीं होता तब तुम धन इकट्ठा करते हो। धन्य वो जो वास्तविक धन को उपलब्ध हो जाता है।”

 

  • धन्यता – जो धन्य हो गया है। जिसे वास्तविक धन प्राप्त हो गया है। मन का आत्मा से एक हो जाना – यही धन्यता है ।”

 

  • जब आत्मा का नूर चहरे पर चमकता है, तब उसे सुंदरता कहते हैं। वही है वास्तविक सौंदर्य – सत्यं शिवं सुन्दरम्।”

 

  • वास्तविक ज्ञान वही है जो पहले से संचित ज्ञान को साफ़ करे और फ़िर स्वयं को भी मिटा दे।”

 

  • जो मन को मारे वो वास्तविक धन है और जो मन की असुरक्षा से निकला हो वो नकली धन है।”

 

  • खुद तक पहुँचना ही वास्तविक समाधान है।”

 

  • आप जिस तल पर हो दुनिया आपको उसी तल पर दिखाई देगी बस आत्मा के तल पर आपको असली साधु का दर्शन हो सकता है ।”

 

  • साधु तुम्हारे द्वार भिक्षा नहीं, तुम्हें मांगने आता है साधु अगर असली होगा तो वो तुमसे धन नहीं तुम्हें मांगेगा ।”

 

  • भक्ति इस बात को नमन है कि मुझसे विराट, मुझसे सुंदर और मुझसे कहीं असली कोई और है। भक्ति परम ज्ञान है।”

 

  • आप असली संत तक पहुँच पाओ इसलिए संसार अपने अंदर नकली संत पैदा कर लेता है |”

 

  • आप संत को उन तरीकों से संत जानते हो जिन तरीकों से समाज ने आपको समझा दिया है| यह समाज की चाल है ताकि आप असली तक जा पाओ| असली तो बुलाता है| वो लगातार बुलाता है |”

 

  • झूठ जब भी आपके सामने आएगा यही कहता हुआ आएगा कि वो असली है, सत्य है |”

 

  • भक्ति का अर्थ है अहंकार से मुक्त होकर अपने से विराट को मान्यता देनाऔर जानना कि वो असली है और मैं नकली हूँ।”

 

  • भक्त कौन? जिसने स्वयं के अलावा किसी दूसरे को महत्वपूर्ण माना है। जिसने जाना है कि वो दूसरा असली है और मैं नकली। जो उस असली में ऐसा मिल जाये कि नकली घुलता रहे।”

 

  • अपने असली साथी को भूलकर, नकली साथी की ख़ोज करते हो और फ़िर वहाँ स्थायित्व की बात करते हो, यही पाप है।”

 

  • असली जब आँखों को ताकत देता है तब आँखें नकली को नकली की तरह देख पाती हैं।”

 

  • ” तेरे लिये तेरे आँसू असली हैं पर मुझे पता है कि ये नकली हैं। इन्हें नकली जानते हुए भी तेरे लिए इनका समाधान करूंगा। ये करुणा है।”

 

  • “एक ढाबे पर तुम जैसा व्यवहार करते हो, क्या तुम किसी फाईव स्टार होटल में भी वैसा ही व्यवहार करते हो? फाइव स्टार होटल इतना बड़ा हो जाता है कि उसके सामने तुम अपने आपको बड़ा छोटा अनुभव करते हो| वो इतना बड़ा हो गया कि उसने तुम्हारा चाल-चलन तक बदल दिया| ये गुलामी हुई की नहीं हुई? और वो कहते हैं कि तुम वैसे कपड़े पहन के आओगे जैसे हम चाहते हैं| अन्यथा हम तुम्हें घुसने भी नहीं देंगे|’ कोई ढाबा तुमसे ये नहीं कहेगा| किसी ढाबे ने तुमसे आज तक कहा है? जवाब दो|”

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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