लोभ

  • हम जीवन ऐसा जीते हैं कि हमारी हर गतिविधि को ऊर्जा भय और लोभ से ही मिलती है।” 

 

  • “क्या ख़रीददार क्या व्यापारी
    इस बाज़ार में सब भिखारी

    विक्रय का लोभ न क्रय कि तैयारी

    आत्मा पूरी ,पूरी शान हमारी

    उलझे यदि तो उलझन भारी

    न भूलो संसार काँटों की झाड़ी”

 

  • “निश्चित रूप से आपको कोई लालच है और वो सामने वाला जानता है कि आपको क्या लालच है, आप वो लालच हटा दीजिए, वो व्यक्ति आपके जीवन पर हावी नहीं हो पाएगा, कोई परिस्थिति हावी नहीं हो पाएगी, समाज में, संसार में, कोई बड़े से बड़ा आप पर हावी नहीं हो पायेगा।”

 

  • “तुम्हें आलस सिर्फ़ वहाँ आता है, जहाँ तुम्हारे पास कोई स्वार्थ नहीं है।”

 

  • “मूढ़ मन इकट्ठा करता है और कुछ नहीं पाता। बोधपूर्ण मन बाँटता है, और और -और पाता है।”

 

  • “जानवर ज़रुरत जानता है, इंसान लालच जानता है।”

 

  •  “संचय करना, इकट्ठा करना, मानसिक बीमारी है इंसान के साथ| ये बीमारी अस्तित्व में कहीं और नहीं पाई जाती।”

 

  • “जानवर ज़रुरत जानता है, इंसान लालच जानता है।”

 

  • “संचय, जानवरों के साथ कभी बीमारी नहीं बनता, क्योंकि उन्हें अच्छे-से पता है कि उन्हें किस सीमा तक जाना है| इंसान अकेला है जिसे अपनी सीमा का पता नहीं है| इंसान अकेला ऐसा है जो पेट से ज़्यादा दिमाग की ख़ातिर कमाता है।”

 

  • “अच्छे आदमी का कोई फायदा नहीं उठाया जा सकता क्योंकि किसी का तुम फायदा उठा सको इसके लिए जरुरी है कि उसमे लालच हो, गौर करो कि जब भी किसी ने तुम्हारा फायदा उठाया है तुम्हे ललचा के उठाया है|”

 

  • “कोई भी तुम्हें लूटता बाद में है पहले तुम्हें ललचाता है|”

 

  • “चालाक आदमी को उसकी चालाकी ही भारी पड़ती है|”

 

  • “कचरे से मोह छोड़ना है वैराग्य; निरंतर सफाई है अभ्यास|”

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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