लक्ष्य

  • हम सोचते हैं कि हम हैं, पथ है और लक्ष्य है। तो लक्ष्य हम से आगे ही होगा।”

 

  • हर लक्ष्य उस आख़िरी लक्ष्य को पाने की चाह है। और वो आख़िरी लक्ष्य है मन का साफ़ होना।”

 

  • जो ऊँचे से ऊँचा लक्ष्य है वो तुम्हारे भीतर है और उसे पाया ही जा चुका है। मन तब धीर है, शांत है।”

 

  • जीवन जीने की कला ही यह है कि उस आखिरी लक्ष्य की प्राप्ति सर्वप्रथम हो। उसको पाओ फ़िर क़दम बढ़ाओ।”

 

  • जो सुरति में है उसे संसार और आत्मा, दोनों उपलब्ध हो जाएँगे | संसार को लक्ष्य बनाना है, निरति को |”

 

  • परम लक्ष्य पहले, बाकी लक्ष्य बाद में।”

 

  • परम लक्ष्य है लक्ष्यहीनता।”

 

  • गुरु लक्ष्य भी बताएंगे और मार्ग भी। हमें तो न ‘राम’ का पता है, उस तक पहुँचने का मार्ग। हमारे लिए तो जो ‘राम’ है, वह बस हमारी कल्पना में ही है।”
  •  व्यर्थ के कचरे से खाली हो जाओ, यही लक्ष्य है।”
  • “बनाना ही है लक्ष्य तो यह बनाओ कि साफ़ हो जाओ, खाली हो जाओ। जो व्यर्थ के विचार और धारणाएँ और दृष्टिकोण न जाने कब तुम में आरोपित कर दिए गए, उन्हें त्याग दो।”
  • “लक्ष्य होते ही नहीं इस काबिल कि उन पर चला जा सके।”

  •  “जितने करीब का तुम्हारा लक्ष्य रहेगा, उतना ज़्यादा वह ईमानदारी का होगा, और उतना ज़्यादा उसको पा लेने की संभावना भी होगी।”

 

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उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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