योग

  • योगभ्रष्ट कौन? जो शिष्य तो बना, पर गुरुता को उपलब्ध हो पाया।”

 

  • भक्ति हमेशा दूसरे(असीम) को महत्व देती है और उसे अंत में ज्ञान की आवश्यकता होती है जो इस बात को काट दे कि दो हैं। तभी विलय संभव हो पाता है, वियोग खत्म हो पाता है।”

 

  • “सन्यासी कौन? जो भोग को भोगले।”

 

  • “बस यही अंतर है दोनों में। सन्यासी और संसारी में। भोगते दोनों है। संसारी वो जिसे भोग भोग ले। समझ रहे हो बात को? शिकारी खुद यहाँ शिकार हो गया। और सन्यासी कौन? जो भोग को भोग ले। यही अंतर है।”

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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