मौन

  • अस्ति है समाप्ति,शून्यता है अनंतता।”
  • जो शब्द मौन से उठे वो संगीत है। जो गीत मौन से उठे वो गीत नहीं विकृति है। जब तुम गाते हो तो सिर्फ़ कर्कशता होती है; जब तुम चुप हो जाते हो तो मौन गाता है, उसमें मधुरता होती है। सुनो, मौन को गाने दो।”

 

  • विचार सदा संसार की ओर उन्मुख रहता है। हम दृश्य से बंधे रहते हैं और दृष्टा की ओर ध्यान नहीं दे पाते। बोध की ओर पहला कदम है कि हम संसार की जगह ज़रा अपने आप को ध्यान से देखें। यही आत्मज्ञान है – अपने कर्मों और विचारों का संज्ञान। और आत्मज्ञान गहराता जाए तो आत्मबोध होने की संभावना है। वहाँ विचार की तरंगें निर्विचार के मौन महासमुद्र में शांत होती जाती हैं।”

 

  • जब शब्द मौन से रहे हों तो बाहर का मौन साधने की क्या आवश्यकता है।”

 

  • जीवन ऐसा हो कि विद्या और अविद्या दोनों साथ चलें, शोर और मौन एक साथ रहें | दोनों तलों को साधना है, और प्रतिपल, और एक साथ |”

 

  • संसारी होना है, सन्यासी होना है | दोनों अधूरे हैं | साथ हों | मौन भी, उद्गार भी; सत्य भी, संसार भी | ऐसे को संसारी-सन्यासी कहते हैं |”

 

  • संसारी-सन्यासी आपको मिलकर भी नहीं मिलेगा, और समझ भी नहीं आएगा | वह बोलते हुए मौन में रहता है और थमे-थमे दौड़ता है |”

 

  • गुरु के शब्दों से नहीं सीखा जाता, उसके शब्दों के पीछे के मौन से सीखा जाता है |”

 

  • जो बात मौन से निकलती है, उसे मौन से ही समझा जा सकता है।”

 

  • आजा से आशय है मूल, मूल सत्य। वो मौन है, वो अनस्तित्व है, वो कबीर का ‘बिंदु’ है।”

 

  • ” हर विचार, हर वाक्य एक समस्या है जो सुलझी नहीं। सुलझाव मौन है। इसलिए समाधान शब्दों में व्यक्त नहीं हो सकता और ये बताया नहीं जा सकता कि ‘क्या समझा’ क्योंकि जो समझा वो ‘कुछ नहीं’ है। शून्यवत है।”

 

  • “मैं जो कुछ कह रहा हूँ, वो सुनाई तो पड़ रहा है पर वो उठ मौन से रहा हैं। लग तो ऐसे रहा है जैसे कोई आवाज़ है, ध्वनि है, पर उसका स्रोत मौन है।”

 

  • “शब्द तुम्हें वही मौन कर पायेगा, जो मौन से उठा भी हो।”

 

  • “शब्द वही सुनने लायक है जो तुम्हें मौन में ले जाए।”

 

  • “व्यक्ति वही भला है, जिसकी संगति में तुम मौन हो सको।”

 

  • “जो शांत है, वो ना अंतर्मुखी है ना बहिर्मुखी है – वो मौन है।”

 

  • तुम सुन भी तभी सकते हो जब तुम ना हो  सुनने के लिए आवश्यक है तुम बिलकुल खाली हो जाओ।”

 

  • “दिया तो जाए शब्द और उतर जाओ मौन में, वही मुरली है|”

 

  • “संन्यासी वह जो दृश्यों के पीछे का दृश्य देख लेता है, जो शब्दों के पीछे का मौन सुन लेता है|”

 

  • “यही मत सुनिए कि कानों पर क्या पड़ा, उसके पीछे का मौन भी सुनिये।”

 

  • “मिलन तो मात्र पूर्ण से पूर्ण का होता है। मौन से मौन मिला। चुप तुम रहो, चुप हम रहे, खामोशी को खामोशी से बात करने दो।”

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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