मृत्यु

  • मृत्यु का अर्थ है- जो था और अब नहीं रहा। जो इस बदलाव को समझ जाता है, वो मृत्यु के पार हो जाता है। वही जीवन-मुक्त हो जाता है।”
  • शरीर और मन समय में हैं। जहाँ समय है, वहाँ मृत्यु है।”

 

  • मृत्यु के तथ्य में गहराई है, विस्तार(विचार, धारणा) नहीं। हम विस्तार को गहराई के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। जीवन में गहराई नहीं है, तो इसे फैला लो। मन है ही ऐसा। वह सतह-सतह पर ही दौड़ लगाता है, गहराई में प्रवेश नहीं करता। जो विस्तार में जीयेगा, उसे दुःख ही मिलेगा।”
  • जीव के लिए ही मृत्यु है।”
  • उसके एक तल पर आकार, रूप, रंग, गति, परिवर्तन, उठना-बैठना, जीवन-मृत्यु हैं, और दूसरे तल पर कुछ नहीं, मात्र बोध | उस तल पर विचार और शब्द नहीं, मात्र बोध है |”
  • जब शरीर से तादात्म्य होता है तब हर भय मृत्यु का ही होता है। मृत्यु एक घटना नहीं है जो घटेगी इस शरीर के साथ। मृत्यु एक विचार है जो हर पल घट ही रहा है ।”
  • हर ख्याल मृत्यु का ही ख्याल है।”
  • सत्य की मृत्यु नहीं हो सकती। सत्य संयोगवश हुई घटना का नाम नहीं है।”
  • मृत्यु के कष्ट की कल्पना मन की गहरी चाल है अपनी असुरक्षा को कायम रखने की। ऐसा मन जीवन बीमा कराएगा, मकान बनवाएगा।”
  • मौत का खौफ ही मृत्युतुल्य कष्ट है ।”
  • जिन क्षणों में आप मौत के कष्ट की कल्पना कर रहे होते हैं उस समय जीवन बड़ा ही कष्टपूर्ण हो जाता है।”
  • मौत की तड़प की कल्पना करने वाले की ज़िन्दगी निःसंदेह गहरी तड़प में बीत रही है।”
  • मौत के ख़ौफ़ को तरक्की का नाम देना, इससे वीभत्स बात हो ही नहीं सकती। हर व्यवसायिक गतिविधि मौत का डर है।”
  • जीना हो तो मौत को चुनना होगा।”
  • जी तो हम लगातार मौत के खौफ में ही रहे हैं – तो यह क्या जीना है!”
  • “‘मौत’ शब्द जब आता है तो बहुत जल्दी वो ‘मेरी मौत’ बन जाता है। फिर हम हम मौत पर स्वस्थ चर्चा भी नहीं कर पाते।”
  • जिन तक मौत की ख़बर पहुँच गई, वो जीना सीख जायेंगे ।”
  • मर्मज्ञ जिसे तरना कहता है, मूढ़ उसे मरना कहता है।”
  • माँ-बाप का भला करने के लिए सबसे पहले ‘बेटे’ को मरना होगा। ‘बेटा’ रहकर कोई माँ-बाप का भला नहीं कर पाया है। ‘बेटा’ मरेगा तभी उसमें गुरु दिख पाएगा।”
  • जीज़स का शरीर मर सकता है, जीज़स का सत्य, जीज़स का तत्व नहीं मर सकता है।”
  • अनंतता अनंत के लिए है। प्रेम प्रेमी के लिए है मुक्ति मुक्त के लिए है। अमरता अमर्त्य के लिए है।”
  •  मौत का अर्थ है मन का थम जाना।”
  • “जिसने मौत से भागना बंद कर दिया वो ज़िन्दगी जीना शुरू कर देता है।”
  • “मौत को जितना देखोगे, फ़िर वो उतना जीवन का अविभाज्य हिस्सा दिखाई देगी। फिर वो जीवन का अंत नहीं दिखाई देगी, वो जीवन का हिस्सा दिखाई देगी। साफ़-साफ़ समझ में आएगा कि बिना मौत के जीवन कैसा। फिर वो डराना बंद कर देगी।”
  • “मृत्यु खेल है, सिर्फ़ तभी जीवन खेल है!  

    मृत्यु लीला है, सिर्फ़ तभी जीवन लीला है।”

  • “मृत्यु के डर का उपचार है -कुछ भी ऐसा पा लेना जो छिनता नहीं है।”
  • “मृत्यु के तथ्य को समग्र रूप से स्वीकार कर लेने में मृत्यु का अतिक्रमण है।”
  • “मौत डराती उसी को है जो मौत का विरोध करता है।”
  • मौत से यारी करोगी तो जीवन अपनेआप तुम्हारा यार हो जाएगा; मौत से दुश्मनी करोगी तो जीवन दुश्मन हो जाएगा।”
  • “जो प्रतिपल मृत्यु को समझ लेगा, वो अमृत तक पहुँच जाएगा।”
  • “पूर्ण मृत्यु ही पूर्ण मुक्ति है, और पूर्ण मृत्यु ही पूर्ण जीवन है ।”
  • “सहज मृत्यु का अर्थ हुआ कि पिछला जो कुछ था, उसे विसर्जित कर दिया, हर क्षण जीवन नया है ।”
  • “जीने की तमन्ना, और मरने का इरादा, अलग अलग नहीं हो सकते । इन्हें एक साथ चलना पड़ेगा। और जो मरने से डरता हो, वो जीने का इरादा छोड़े, जीने की तमन्ना छोड़े ।”
  • “निर्वाण का मतलब है उम्मीद का बुझ जाना|”
  • “जो मन पदार्थों में जीता है, उसे पदार्थ की ख़ुराक लगातार चाहिए, नहीं तो वो मर जाएगा।”

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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