मूल

  • रस ना छिलके में उलझे रहने से मिलेगा और ना ही गन्ने के परित्याग में। छिलके के इतने करीब जाओ कि उसके मूल तक ही पहुँच जाओ।”

 

  • संसार परमात्मा का छिलका है। और एक नहीं, कई छिलके, प्याज़ की तरह। और इन छिलकों के नीचे मूल कहीं छिप सा गया है।”

 

  • जो मूल के करीब हो जाता है वो फूल को सहजता से प्राप्त कर लेता है| मूल की अभिव्यक्ति है फूल |”

 

  • आध्यात्मिक व्यक्ति- जो मूल में फूल देखे, और फूल में मूल | जो फूल और शूल दोनों को एक समान देखे |”

 

  • मूल भी तुम, फूल भी तुम, आत्मा भी तुम, जीव भी तुम| यही ज्ञान है, यही प्रेम है और यही आहिंसा है| ज्ञान जब गहरा होता है, तब प्रेम बन जाता है |”

 

  • आजा से आशय है मूल, मूल सत्य। वो मौन है, वो अनस्तित्व है, वो कबीर का ‘बिंदु’ है।”

 

  • यहाँ बेटे से आशय है अहम वृत्ति। समस्त वृत्तियों की मूल वृत्ति।”

 

  • हम वो हैं जो मूल और फूल को एक साथ नहीं देख सकते। सत्य और संसार को अलग-अलग देखना ऐसा ही है जैसे कोई फूल और मूल को अलग-अलग समझे। जैसे कोई एक वृक्ष को अपने खंडित मन से खंड-खंड देखे। यही तो निशानी है खंडित मन की: उसे सब अलग-अलग दिखाई देता है; वो सुख में दुख, और सुख-दुख में आनंद नहीं देख पाता। फूल, शूल और मूल सब अलग-अलग हैं उसके लिए। टुकड़े देखे तो संसार, पूरा देखा तो सत्य।”

 

  • सुख-दुःख समान हैं, इसका अर्थ यह नहीं है क़ि दोनों को अनुभव ही करो- ऐसा तो मुर्दा करता है। इसका अर्थ है यह जानना कि दोनों का मूल एक ही है। सुख में डूब कर सुखी हो और दुःख में डूब कर दुखी हो। सुख-दुःख का विरोध, अहंकार है। संत सुख और दुःख दोनों को गहराई से अनुभव करता है। तुमने जिसको गहराई से अनुभव कर लिया, तुम उससे अस्पर्शित हो जाओगे।”

 

  • साधु वो जो शब्दों को छोड़ सके और मूल बात को पकड़ सके।”

 

  •  “मूल रूप से तुम क्या हो उसकी परवाह करो।

    फिर तुम्हारे सारे सम्बन्ध ठीक हो जायेंगे।”

 

  • “मूल अंतर बस दो  हैं- बाहर और भीतर ’”

 

  • “संसारी, साधक और समाधिस्त में यही तो मूल अंतर है। संसारी को चारों तरफ़ वैविध्य ही वैविध्य दिखाई देता है, सब कुछ अलग अलग-अलग। साधक को बस दो दिखाई देते हैं, सत्य और असत्य और समाधिस्त को बस एक दिखाई देता है, सत्य।”

 

  • “मूल, उद्गम, स्त्रोत| मन को वहाँ जाना है| जहाँ से मन आया है, वहीँ पर वो शांत हो पाएगा| वहाँ पहुँच गए, वो लगने लग जाएगा|”

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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