मूल्य

  • समर्पण है किसी चीज़ की मूल्यहीनता को जान लेना। समर्पण ऐसे जैसे पेड़ से पत्तों का गिरना, या हाथ से जलता हुआ कोयला छोड़ देना ।”

 

  • कीमत उस शब्दकोश की नहीं जहाँ से शब्द रहे हैं, कीमत उस स्रोत की है जहाँ से इन शब्दों को समझने की ताक़त मिली है।”

 

  • संसार की कोई कीमत नहीं सन्यास के बिना | कितने दिन चलेंगी पत्तियां जड़ों के बिना?”

 

  • मुक्ति का विचार उठ रहा है, यह तो ठीक है, पर यह विचार भी करो कि मुक्ति की कीमत क्या है। क्या वो कीमत देने को तैयार हो?”

 

  • जो कुछ भी कीमती है वो बेशर्त होता है, मुफ़्त होता है।”

 

  • जो तुम्हें मिलना ही है, जो भी कुछ कीमती है, उसके और तुम्हारे बीच बस डर है।”

 

  • फ़ायदे का फ़ायदा क्या?”

 

  • “आप स्वयं मूल्यों की स्थापना करते हैं, अपने मूल्यों का प्रदर्शन कर के। तो होशियार रहें कि आप के मन में कौन से मूल्य पल रहे हैं। आप जिस किसी को मूल्य देते हैं ना, वही आपकी ज़िंदगी बन जाता है। जो आपकी ज़िंदगी बन जाता है, वही आपके द्वारा स्थापित उदाहरण बन जाता है।”

 

  • “फर्क नहीं पड़ता कि क्या महत्वपूर्ण लग रहा है। ये मत सोचना कि कुछ ज़्यादा महत्वपूर्ण है, कुछ कम महत्वपूर्ण है तो जो वास्तव में महत्वपूर्ण है उसी को महत्व दें। न। दृश्य, गंध, शब्द, स्पर्श, विचार, धारणा, व्यक्ति, वस्तु – जब भी कुछ लगे कि कुछ बड़ा हो रहा है तुम्हारे लिए-हावी और महत्वपूर्ण, तभी समझ जाओ कि ये तो मूलभूत नियम के खिलाफ कुछ हो रहा है।”

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

 

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