मुक्ति

  • भौतिकता क्या है? भौतिकता है यह कहना कि सबसे ऊपर मन और इन्द्रियां हैं। कि जो कुछ है, इंद्रियगत है। और यदि कुछ ऐसा है जो आँखें नहीं देख सकती, जो स्पर्श नहीं किया जा सकता, जिसे कान सुन नहीं सकते, और मन विचार नहीं कर सकता, तो वो है ही नहीं। भौतिक मन के लिए आत्मा तो नहीं ही है, साथ ही प्रेम, आनंद और मुक्ति भी नहीं हैं। यही उसकी सज़ा है।”

 

  • हमें सबसे ज़्यादा डर अपने आप से लगता है। डरने वाले भी हमीं, डराने वाले भी हमीं, और डर से मुक्ति भी हमीं। क्या खेल है!”

 

  • समय से मुक्ति चाहिए तो समय को महत्व देना बंद करो।”

 

  • अहम् अकेला नहीं रह सकता। उसे सदा किसी विषय की तलाश रहती है; विषय ही अहम् को अर्थ और जीवन देता है। विषय के साथ जुड़ना बंधन है, पर विषयातीत के साथ भी जुड़ा जा सकता है। परम मुक्ति है, जब अहम् विषयातीत के साथ जुड़ जाता है। मुक्त के साथ जुड़ते ही अहंकार नहीं बचता है। जो बंधन के साथ खुद को जोड़ने से मना कर दे, वो खुद ही मुक्त के साथ जुड़ जायेगा। मना करने की असीम ताकत, आख़िरी बात, तुम्हारे ही हाथ में दे दी गई है। बस मना कर दो।”

 

  • प्रेमी कहता है साहिब मिल गए। ज्ञानी कहता है मुक्ति मिल गई। एक ही बात है।”

 

  • मुक्ति की उड़ान में तुम्हारी दीवारों का कोई काम नहीं।”

 

  • मेरी बातों को समझ के चौखटे में लाने की कोशिश मत करो। जो समझता फिरता है उसी से तो तुम्हें मुक्ति चाहिए। मत समझो, बस साथ चलो।”

 

  • मुक्ति का विचार उठ रहा है, यह तो ठीक है, पर यह विचार भी करो कि मुक्ति की कीमत क्या है। क्या वो कीमत देने को तैयार हो?”

 

  • जहां स्वार्थ सिद्ध हो वहां कभी आलस नहीं आता; आलस मन की स्वयं को बनाए रखने की चाल है। हमने सत्य, मुक्ति को बहुत पीछे की प्राथमिकता दी है, जहाँ सत्य और मुक्ति होंगे वहां हमें आलस जाएगा। नींद, आलस अहंकार का कवच हैं।”

 

  • हम जो हैं उसका कारण अतीत में ही है, पर यही रास्ता भी है मुक्ति पाने का।”

 

  • मनुष्य जीवन अवसर इसलिए है क्योंकि तुम कितनी ही बेड़ियों में हो, तुम्हें मुक्ति सदा उपलब्ध है।”

 

  • सत्य निर्विचार में है। निर्विचार में ही सुख-दुःख से मुक्ति है।”

 

  • हमें मुक्ति अपने प्रयत्नों से नहीं, समर्पण से मिलेगी।”

 

  • कुछ पाने की हर इच्छा प्रेम और मुक्ति की है| पर तुम्हें पकड़ा दिए गए हैं धारणाएं और बंधन |”

 

  • अनंतता अनंत के लिए है। प्रेम प्रेमी के लिए है मुक्ति मुक्त के लिए है। अमरता अमर्त्य के लिए है।”
  • तुम बाँध लो मन को पूरे तरीके से कि “ये नहीं करेगा! वो नहीं करेगा!” चलो ठीक है। बाँध लो, पर उससे होना क्या है? हो तो तुम शरीर ही ना? संसार में ही हो ना? सूख जाओगे, झड़ जाओगे। तो अपने आप को उपद्रव करने की भी एक स्वस्थ छूट देनी चाहिए। आपने आपको बेवकूफ बनने की भी छूट देनी चाहिए।”
  • “मुक्ति की इच्छा का अंत हो जाना ही मुक्ति है।”
  • “तलाशना नहीं है, तलाश से मुक्त हो जाना है।”
  • “तुम जहाँ पर हो, मुक्ति वहीँ पर है।”
  •  “जिस दिन सोच लोगे कि उड़ना है, उस दिन पाओगे कि सब कुछ उड़ने में ही मदद कर रहा है।”
  •  “शरीर से मुक्ति चाहते हो, तो शरीर को शरीररहने दो। जिन्हें शरीर से मुक्ति चाहिये हो, वो शरीर के दमन का प्रयास बिल्कुल न करें। जिन्हें शरीर से ऊपर उठना हो, वो शरीर से दोस्ती करें। शरीर से डरें नहीं, घबरायें नहीं।”
  • “असली आज़ादी तो यही है कि तुम अपने स्रोत को हासिल करलो। वही मुक्त है अकेला।”
  • “पूर्ण छोड़ देने का नाम ही, ‘मोक्ष’ है।”
  •  सच, डर से मुक्ति देता है, और झूठ, डर में और गहरे धकेलता है।”
  • नाबोलना मुक्ति की दिशा में पहला कदम है। जो लगातार हाँही बोले जा रहा है, वो मशीन है।मशीन कभी नानहीं बोलती। तुम्हें इन्कार करना आना चाहिए। तुम्हें नाबोलना आना चाहिए।‘नाका अर्थ है बेहोशी को नाकहना। नाका अर्थ है गुलामी को नाकहना। नाका अर्थ है होश को हाँकहना। जब तुम बेहोशी को नाकहते हो, तो इसका मतलब होश को हाँकह रहे हो। जब तुम गुलामी को नाकहते हो, तब तुम मुक्ति को हाँकह रहे हो।
  •  “निर्भरता, मुक्ति की दुश्मन है।”
  • “तुम्हें मुक्ति के पीछे नहीं भागना है बस मुक्ति के रास्ते  से हटना है।”

  • “तुम्हारी परम मुक्ति में ये भी शामिल है कि तुम मुक्ति से दूर भागो।”
  • “जो मुक्त है सिर्फ वही बंध सकता है।”
  • “ध्यान आपको मुक्त करता है विचार से और दान मुक्त करता है वस्तु से। तो जब ध्यान और दान एक साथ हो जाते हैं तो आप विचार और वस्तु दोनों से मुक्त हो जाते हैं।”

  • “परिपक्वता का अर्थ है अनावश्यक से मुक्ति।”
  • “दासता से मुक्ति ही इसी में है कि परम के दास हो जाओ।”

  • “मुक्त हो कर के घूम लिए तो मुक्ति और मुक्त हो कर के ठहर लिए तो भी मुक्ति ।”
  • “मुक्ति है झंझटों से मुक्ति ।”
  • “पूर्ण मृत्यु ही पूर्ण मुक्ति है, और पूर्ण मृत्यु ही पूर्ण जीवन है ।”
  • “कौन है गुरु? जो आदत से मुक्ति दिला दे।”
  • “जीवन-मुक्ति, समस्त प्रकार की मुक्ति संत के माध्यम से सबको मिलती है|”
  • “मुक्ति का अर्थ है: जीवन पर पड़े बंधनों से मुक्ति।”
  • “जिसने मुक्ति और बंधन दोनों को चाहना छोड़ दिया, सो हुआ मुक्त।”
  • “मैं दोहरा रहा हूँ: जिसको मुक्त होना है, उसे अपनेआप से ही मुक्त होना है। उसे अपने ही विरुद्ध खड़ा होना पड़ेगा।”
  • “करुणा और प्रतिकार से मुक्ति, ये संतत्व के लक्षण है।”
  • “प्रतिक्रिया से मुक्ति तो तभी मिलती है, जब भीतर से इतने स्वस्थ हो जाओ, इतने परिपूर्ण हो जाओ कि आहत हो ही न पाओ।”

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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