माया

  • जो भयानक है वो कुछ छीन नहीं सकता,जो आकर्षक है वो कुछ दे नहीं सकता।”

 

  • माया का मंत्र: ज़िन्दगी गर्मागर्म, कौन सा भ्रम?”

 

  • यह बात कि संतो को माया से कोई मतलब नहीं, यह बात बहुत मायावी है। संत तुम्हारी किसी छवि जैसा नहीं होता! वह माया से खेलता है, माया उसकी बांदी है।”

 

  • जहाँ ध्यान नहीं, वहीं माया है। ध्यान के अभाव में लीला ही माया बन जाती है।”
  • “कुछ भी ईश्वर से अलग समझना ही माया है | “

  • “माया का प्रतीत होना ही माया है | माया मात्र एक छल है, जो आपको छल ही तब तक रहा है जब तक आपको प्रतीत हो रहा है | माया को समझकर माया से मुक्त नहीं होते | माया से मुक्त वो है जिसको अब माया दिखती ही नहीं |”

  • “माया उस पड़ोसन की तरह है, जो आपके पास आपकी शुभचिंतक बनकर आती है, और कहती है, “कितने दुखी हो तुम।” वो पहले तुम्हें ये बताएगी, “तुम्हारी ज़िंदगी में कोई कमी है। तुम्हारे साथ बड़ा बुरा हुआ।” और फिर वो तरीके बताएगी उस कमी को पूरा करने के।”
  • “माया और मोक्ष में इतना ही अंतर है-

    माया कहती है, छोटे की इच्छा से काम चल जाएगा। और मोक्ष कहता है, परम की इच्छा के बिना चलेगा नहीं।”

  • “माया क्या है?

    जो नहीं है उसका भासित होना ही माया है।”

  • “माया भीतर से घेरती है संस्कार बन के और बाहर से घेरती है नकली गुरु बन के।”
  • “जो ही विषय मन में भरा हुआ है, सो ही माया है।”
  • “जहाँ कही भी मन जाकर बैठ जाए, उसका नाम माया है।”
  • “मूढ़ में और ज्ञानी में यही अंतर है| एक सी तरंगे दोनों के कान में पड़ती हैं| एक कहता है, “यह तो चिड़िया की आवाज है”, दूसरा कहता है, “नहीं परमात्मा बोला”| एक ही दृश्य दोनों को दिखाई देता है एक कहता है, “यह देखो, यह संसार की माया है”, दूसरा कहता है, “माया सो है ठीक, पर हमें कुछ और भी दिख रहा है”|”

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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