महत्ता

  • आत्मा सार है। संसार आत्मा का छिलका है। अपने जीवन को देखें कि उसमें कितना महत्व है सार के लिए और कितना छिलके के लिए।”

 

  • सीमा के अंदर रहने वाला गृहस्थ है और सीमा के पार जाने वाला साधु। दोनों अपने-अपने कारागृह में कैद हैं। एक सीमा के बाहर नहीं जा सकता तो दूसरा अंदर नहीं सकता। हम सभी के अंदर यही दो व्यक्ति जी रहे हैं। किसी तीसरे की हमें ख़बर ही नहीं है। उस तीसरे के चित्त में सीमाओं का कोई महत्व ही नहीं है। वही ‘हरिजन’ है।”

 

  • अहंकार अपने से ज़्यादा किसी को महत्व नहीं देता।”

 

  • भक्ति में ‘तुम’, ‘तू’, ‘आप’ शब्द बहुत महत्वपूर्ण हो जाते हैं ।”

 

  • भक्त कौन? जिसने स्वयं के अलावा किसी दूसरे को महत्वपूर्ण माना है। जिसने जाना है कि वो दूसरा असली है और मैं नकली। जो उस असली में ऐसा मिल जाये कि नकली घुलता रहे।”

 

  • समझदार व्यक्ति संसार को इतना भी महत्व नहीं देता कि उसका परित्याग करे।”

 

  • भक्ति हमेशा दूसरे(असीम) को महत्व देती है और उसे अंत में ज्ञान की आवश्यकता होती है जो इस बात को काट दे कि दो हैं। तभी विलय संभव हो पाता है, वियोग खत्म हो पाता है।”

 

  • समय से मुक्ति चाहिए तो समय को महत्व देना बंद करो।”

 

  • हम अपने-अपने संसार के केंद्र में हैं और ‘हम’ सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं ।”

 

  • जो त्यागना है वही मन के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है और यह सहजता नहीं है। आकर्षण, विकर्षण ।”

 

  • जितना तुममें देहभाव गहरा होगा, उतना ही संसार तुम्हारे लिए महत्वपूर्ण रहेगा। संसार को शून्य जानने के लिए वो दृष्टि चाहिए, जो पहले खुद को शून्य जाने।”

 

  • सतही प्रेम में विषय महत्वपूर्ण होता है। लेकिन जैसे-जैसे प्रेम गहराता जाएगा, वैसे-वैसे रूप, रंग, आकार के होने का भाव ही जाता जाएगा। और केवल तभी सहज संबंध हो सकता है।”

 

  • “कहानी हम सबकी ऐसी ही है। हम जिस चीज़ का दावा करते हैं, महत्वपूर्ण मानने का, वक़्त आने पर हम उससे टकरा के निकल जाते हैं।”

 

  • “गुस्सा बढ़ता ही इसीलिए है क्योंकी हमने उसको बड़ी महत्वपूर्ण बात मान रखा है|”

 

  • “सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न वो होते हैं, जो कभी पूछे ही नहीं जाते। और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न वो होते हैं जिन्हें हमें अपने अंतरस्थल में दमित करके दफन कर रखा होता है। हमारी हिम्मत ही नहीं होती पूछने की।”

 

  • “जो हो रहा है, उससे ज़्यादा महत्त्वपूर्ण वो है, जो नहीं हो रहा, उसको मत भूल जाना।”

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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