मनुष्य

  • जब मनुष्य होने के भाव से मुक्त हुए, तब जानना की मनुष्य हुए।”

 

  • मनुष्य जीवन इसलिए मुश्किल है क्योंकि हर क्षण सब कुछ बदल जाता है, और इसी बात से दुःख मिलता है।”

 

  • मनुष्य जीवन अवसर इसलिए है क्योंकि तुम कितनी ही बेड़ियों में हो, तुम्हें मुक्ति सदा उपलब्ध है।”

 

  • मनुष्य गहरी से गहरी प्यास है और स्वयं ही उस प्यास को बुझाने वाला झरना भी |”

 

  • मनुष्य एक तल पर अंतहीन भटकाव है और दूसरे तल पर शांत बिंदु | उसके एक तल पर गहरे से गहरा अज्ञान, अन्धकार है और दूसरे तल पर साफ़ ज्ञान की रोशनी |”

 

  • मनुष्य के एक तल पर दौड़ है और दूसरे तल पर, ठहराव | इन दोनों तलों के एक साथ पाए जाने का ही नाम मनुष्य है |”

 

  • मनुष्य जन्म की सबसे बड़ी त्रासदी: हारे हुए को जिताने की कोशिश।”

 

  • जब मनुष्य होने के भाव से मुक्त हुए, तब जानना की मनुष्य हुए।”

 

  • मनुष्य जीवन इसलिए मुश्किल है क्योंकि हर क्षण सब कुछ बदल जाता है, और इसी बात से दुःख मिलता है।”

 

  • मनुष्य जीवन अवसर इसलिए है क्योंकि तुम कितनी ही बेड़ियों में हो, तुम्हें मुक्ति सदा उपलब्ध है।”

 

  • “मनुष्य वही जो मनुष्यता की सीमाओं के पार जाए|”

 

  • “जब मनुष्य होने के भाव से छुटकारा मिल जाए, तब समझिए कि मनुष्य हुए। “

 

  • “मनुष्य जन्म की सार्थकता वास्तव में उसको ही, जिसने मनुष्य होने के भाव से ही छुटकारा पा लिया।”

 

  • “मनुष्य होने का वास्तविक अर्थ हैमनुष्यत्व की साधारण सीमाओं का अतिक्रमण।”

 

  • “ये जो उत्सुकता है न, ‘ज्वर’, ‘तपन’, ‘उत्तेजना’, यही वो है जो मनुष्य को मनुष्यता से नीचे गिराती है।”

 

  • “बुद्धिमान वही है जो मज़ाक में दी गयी सीख को भी सीख ले| जो सूक्ष्मतम इशारे से भी समझ जाए| जो गुरु के शब्दों की प्रतीक्षा न करे, जो गुरु के होने से जान ले।”

 

  • “विकसित दुनिया में ज़्यादातर जो मानसिक रोगी हैं, वो वही हैं जिन्होंने वो सब पा लिया जो वो चाहते थे। वो पागल हो गए उसके बाद। वो भूखे नंगे लोग नहीं हैं। तुम्हें लगे कि पागलखाने में ऐसे लोग होंगे, भिखारी जैसे। न। वो सब बड़े सफलता पाने वाले लोग हैं। उन्होंने पा लिया। और पा के पता चला कि ये तो अपमानित हो गए। फिर पागल हो जाता है आदमी।”

 

  • “जो किसी और के बताने से पता चले, वो बदल जायेगा, मिट जायेगा, या समय उसको धुंधला कर देगा। जो आपके भीतर से विस्तीर्ण होता हो, वो तो रहेगा। उस पर भरोसा करना सीखिये।”

 

  • “संसारी कौन? जिसे भोग भोग ले।”

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उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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