बेचैनी

  • मन की वृद्धि ही मन की अशुद्धि।”

 

  • बेचैनी भी झूठी, इलाज भी झूठा।”

 

  • बेचैनी आशा रूप में: कुछ मिल जाएगा। बेचैनी ममता रूप में: कुछ छूट जाए। आशा और ममता तब उठते हैं जब आप सत्य से दूर होते हैं।”

 

  • आशा-बेचैनी का झूठा इलाज।”

 

  • तुमने जिधर को भी कदम बढ़ाया है, उसी की ओर बढ़ाया है- कभी जान के, और कभी अनजाने में। मंज़िलें चाहे कुछ भी हों, रास्ते चाहे कहीं भी ले जाते हों, पर उसके अलावा तुम कभी किसी ओर बढ़े ही नहीं। वही तुम्हारी पहली और आख़िरी तलब है, वही तुम्हारे सपनों का सबब है, वही तुम्हारे आंसुओं की पुकार है, वही तुम्हारी बेचैनी और करार है। कभी जान के, कभी अनजाने में।”

 

  • शान्ति का प्रयास ही अशांति है।”

 

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उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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