बुद्धि

  • दो प्रकार की मूर्खताएं हैं: नकल और अकल। जो नकल करता है वो दूसरे को श्रेष्ठ मानता है, और जो अकल लगाता है, उसे अपनी बुद्धि पर भरोसा है। दोनों नासमझ हैं। नकलची बनो अकलची।”

 

  • विज्ञापन से बचो। विज्ञापन मनोरंजन नहीं, तुम्हारे मन पर आक्रमण हैं। विज्ञापन बुद्धि के साथ धोखा और कामना के लिए न्यौता हैं।”

 

  • “बुद्धि का काम होता है अर्थ  देना| बुद्धि का काम होता है, तोड़ कर देखना| मन इतना ही करेगा कि छवि खड़ी करेगा| फिर उस छवि को पुराने सारे ज्ञान से जोड़ करके देखना, उसके हिस्से करना, उनका भविष्य के लिए क्या अर्थ बन सकता है यह सारे प्रक्रमण करना, ये काम जो भीतर करता है, उसको कहते हैं बुद्धि|”

 

  • “आप अगर पाते हैं कि आपकी ज़िंदगी में क्षुद्रता, संकीर्णता, तनाव, खिंचाव बहुत है तो साफ़ समझ लीजिए कि बुद्धि तो है आप के पास, समर्पण जरा नहीं है। बुद्धि, संसार का माया जाल तो काट सकती है पर माया के स्रोत तक आपको नहीं पहुँचा सकती।”

 

  • “बुद्धि, तर्क और स्मृति, आपके ग़ुलाम होने चाहियें, मालिक नहीं।”

 

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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