बंधन

  • तुम्हारी उपयोगिता ही तुम्हारा बंधन है।”

 

  • मन की दौड़ ही मन का बंधन है।”

 

  • अहम् अकेला नहीं रह सकता। उसे सदा किसी विषय की तलाश रहती है; विषय ही अहम् को अर्थ और जीवन देता है। विषय के साथ जुड़ना बंधन है, पर विषयातीत के साथ भी जुड़ा जा सकता है। परम मुक्ति है, जब अहम् विषयातीत के साथ जुड़ जाता है। मुक्त के साथ जुड़ते ही अहंकार नहीं बचता है। जो बंधन के साथ खुद को जोड़ने से मना कर दे, वो खुद ही मुक्त के साथ जुड़ जायेगा। मना करने की असीम ताकत, आख़िरी बात, तुम्हारे ही हाथ में दे दी गई है। बस मना कर दो।”

 

  • कुछ पाने की हर इच्छा प्रेम और मुक्ति की है| पर तुम्हें पकड़ा दिए गए हैं धारणाएं और बंधन |”
  • “सँसार महा बंधन है, पर यही सँसार, मुक्ति का अवसर भी है। सब-कुछ ‘तुम’ पर निर्भर करता है।”
  • “बंधन को मान्यता देना ही तो भ्रम है।”

  • “जब अपना कुछ नहीं होता, उसी स्थिति को गुलामी कहते हैं |”
  • “तुम्हारी चालाकी ही तुम्हारा बंधन है; जो सरल है वो स्वतंत्र है|”
  • “तुम्हारी चतुराई और तुम्हारी होशियारी, यही तुम्हारा नरक है।”
  • “जहाँ कुछ भी पूर्व निर्धारित है, वहाँ बंधन है।”
  • बंधनों को तोड़ कर के आप जो भी हासिल करेंगे, वो आपको जो अनुभूति देगा, वो आपको रोजमर्रा के कामों में नहीं मिल सकता।”
  • “जिसको मुक्ति नहीं आती, बंधन उसके लिए कष्ट है। जो मुक्ति जानता है, वो बन्धनों से खेलता है।”
  • “दुनिया को जो कुछ भी मूल्यवान लगता है, वही तुम्हारा बोझ है।”
  • “जो कुछ भी बाहरी है, वो बंधन रहेगा हमेशा।”
  • ” जिसने संसार को समझ लिया है बंधन उसके लिए खेल हो जाते हैं, वो इन्हीं में मज़े लूटता है।”

 

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उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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