प्रार्थना

  • समर्पण का अर्थ है असीम बल। तुम अपने आप को जो मानते हो वही तुम्हारी कमज़ोरी है। अपनी कमज़ोरी का समर्पण कर दो। प्रार्थना करो और प्रतीक्षा करो कि वो पुकारे। उसकी पुकार ही तुम्हारा आत्मबल बनेगी। और तुम भागे चले जाओगे, अपना सारा कचड़ा पीछे छोड़ कर, यही समर्पण है।”

 

  • परम से परम को मांगना, सो है प्रार्थना: कि तुमसे कुछ नहीं चाहिए, बस तुम ही जाओ।”

 

  • “ध्यान और प्रार्थना का कोटा नहीं पूरा किया जाता। ध्यान और प्रार्थना में निरंतर रहा जाता है, उसमें जिया जाता है।”

 

  • “पढ़ना किसी काम न आया अगर भज न पाए।”

 

  • “मन से लड़ना, मन को और ताकत दे देगा| चुप-चाप सर झुका दो हो जाएगा, उसी का नाम प्रार्थना है |”

 

  • “सवाल अगर ईमानदार है, तो प्रार्थना स्वतः स्वीकार हो जाती है।”

 

  • “प्रार्थना का अर्थ होता है : जो ऊँचे से ऊँचा है, वो माँगना।”

 

  • “प्रार्थना में आँखें बंद होंगी, प्रेम के गहनतम क्षणों में भी आँखे बंद होंगी। और जो प्रार्थना में भी आँखे खोल के बैठा हो, ये आदमी परम को कभी नहीं पाएगा। जो गहरे प्रेम में भी आँखें खोल के बैठा हो, वो प्रेम को कभी नहीं पाएगा।”

    ——————————————————

    उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

Leave a Reply