प्रकृति

  • “संसार का विरोध इसलिये क्योंकि संसार की प्रकृति है प्रभावित करना, संस्कारित करना| जो संसार के आकर्षण से न खिंचे और उसके डराने से न डरे, वो संसार का विरोध ही कर रहा है| उस विरोध के लिए गहरा समर्पण चाहिए| तो संसार का विरोध करो ताकि तुम संसार में प्रेम से रह सको| जितना गहरा प्रेम, उतना गहरा विरोध |”

 

  • बाहर-बाहर प्रकृतिस्थ, अंदर-अंदर समाधिस्थ।”

 

  • संसार की प्रकृति ही वैर है।”

 

  • बाहर-बाहर जो प्रकृतिस्थ हो जाता है वही अंदर से समाधिस्थ हो पाता है।”

 

  • अहंकारी व्यक्ति प्रकृति का तो विरोध करता ही है, वो परमात्मा का भी विरोधी होता है।”

 

  • हमने प्रकृति का तो शोषण किया ही है, मंदिर को भी भ्रष्टाचार का अड्डा बना रखा है।”

 

  • प्रकृति और परमात्मा साथ हैं। इनसे अगर कुछ छिटका हुआ है तो वो अहंकार है।”

 

  • जिसे प्रकृति में शीतलता मिलने लगी, वो आध्यात्मिक हो गया।”

 

  • अहम् भाव जब प्रकृति से जुड़ जाता है तो शरीर कहलाता है।”
  • “प्रकृति में कुछ स्थायी भी है, कुछ अस्थायी भी है। सिर्फ़ इसलिए कि कुछ स्थायी लग रहा है तो इसका मतलब वो प्रकृति से बाहर नहीं है, वो भी प्रकृति ही है।”

 

  • “प्रकृति ही करती है और प्रकृति ही भोगती है| जब तुम वहाँ हो जाओगे, जहाँ न करना है और न भोगना है, तब तुम ग्रहण करने से मुक्त हो गए।”

 

  • “अप्रभावित होना मन का स्वभाव है पर प्रभावित होना उसकी प्रकृति।”

 

  • “कृष्ण तब हुए तुम, जब प्रकृति से एक होने के लिए, प्रकृति को तुम्हें आवृत ना करना पड़े, तब कृष्णत्व है। जब सामने वाले को पूरी तरह जानते हो, और फिर भी वो प्यारा लगे, तो तुम कृष्ण हुए।”

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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