पीड़ा

  • पीड़ा है सहज स्वभाव से दूरी।” 
  • “क्या ख़रीददार क्या व्यापारी
    इस बाज़ार में सब भिखारी
     

    विक्रय का लोभ न क्रय कि तैयारी
    आत्मा पूरी ,पूरी शान हमारी

    उलझे यदि तो उलझन भारी
    न भूलो संसार काँटों की झाड़ी

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    उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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