परिवार

  • सीमा के अंदर रहने वाला गृहस्थ है और सीमा के पार जाने वाला साधु। दोनों अपने-अपने कारागृह में कैद हैं। एक सीमा के बाहर नहीं जा सकता तो दूसरा अंदर नहीं सकता। हम सभी के अंदर यही दो व्यक्ति जी रहे हैं। किसी तीसरे की हमें ख़बर ही नहीं है। उस तीसरे के चित्त में सीमाओं का कोई महत्व ही नहीं है। वही ‘हरिजन’ है।”

 

  • “असली अभिवावक हो पाना, असली माँ-बाप हो पाना उतना ही मुश्किल है जितना असली औलाद हो पाना| बहुत कम बेटे-बेटियाँ होते हैं जो असली बेटे-बेटियाँ होते हैं और बहुत कम माँ-बाप होते हैं जो कि असली माँ-बाप होते हैं|”

 

  • “अस्वस्थ अभिवावकों से स्वस्थ बच्चा कैसे आएगा? मैं फिर कह रहा हूँ ‘असली माँ-बाप वो जो शारीरिक रूप से जन्म दें और फिर मानसिक रूप से भी जन्म दे पाएँ| तब असली माँ-बाप हुए, वो कम होते हैं|”

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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