परिपूर्णता

  • सीमित है ही सीमित। उससे कैसे पूरा मिल सकता है। पूर्ण से ही पूर्ण मिल सकता है।”

 

  • जिन क्षणों में आप मौत के कष्ट की कल्पना कर रहे होते हैं उस समय जीवन बड़ा ही कष्टपूर्ण हो जाता है।”

 

  • बिंदु की लीला से ‘अहं’ वृत्ति का जन्म होता है। तो अहं वृत्ति एक अपूर्णता के साथ पैदा होती है। वही अपूर्ण, पूर्ण होने के लिये साथी चाहता है, विषय चाहता है।”

 

  • संसार का अर्थ है- आप पूर्ण रूप से किसी के हो सके, और आप पूर्ण रूप से कुछ त्याग सके| जिसको पाया उसको पाया नहीं, जिसको छोड़ा उसको छोड़ा नहीं |”

 

  • आत्मा पूर्ण है और संसार अपूर्ण| जो अपूर्ण है वो भी पूजनीय है, क्योंकि वह अभिव्यक्ति उसी पूर्ण की है |”

 

  • हमारी हर तलाश उस रिक्तता को, उस अपूर्णता भरने की कोशिश है।”

 

  • असाधारण होना सब चाहते हैं और ये बड़ी साधारण बात है। असाधारण तो यह है कि असाधारण होने की कोई लालसा ही नहीं है।”

 

  • सब सदा सर्वथा पूर्ण।”

 

  • पूरे भी तुम, अधूरे भी तुम।”

 

  • “पूर्णता बताने की बात नहीं है, पाने की बात है।”

 

  • “दे पाने की पात्रता, आपकी पूर्णता से शुरू होती है।”

 

  • “जीवन ऐसा जीयो जिसमें पूर्णता पहले ही विद्यमान हो ताकि तुम्हें कर्म के माध्यम से पूर्णता न तलाशनी पड़े।”

 

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उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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