नैतिकता

  • संसार आध्यात्मिकता को नैतिकता के तल तक ले आता है।”

 

  • नैतिकता, धार्मिकता का भ्रामक विकल्प।”

 

  • वही जो हमें भोग के लिए ललचाते हैं, वही नैतिकता के माध्यम से भोग को बुरा बताते हैं।”

 

  • आम मन समाज और नैतिकता से भरा होता है। इसी कारण उसमें प्रेम के लिए कोई जगह नहीं होती। प्रेम सामाजिक होता है नैतिक होता है। प्रेम बस आध्यात्मिक होता है।”

 

  • “जब नैतिकता ख़त्म हो जाती है, तो नैतिकता का प्रशिक्षण शुरू हो जाता है। नैतिकता का प्रशिक्षण इस बात का पक्का सबूत है कि नैतिकता ख़त्म है।” जब प्रेम ख़त्म हो जाता है, तो प्रेम की बातें शुरू हो जाती हैं। और प्रेम की बातें इस बात का पक्का सबूत हैं कि प्रेम ख़त्म है। जब धर्म ख़त्म हो जाता है, तो धार्मिक शिक्षा शुरू हो जाती है।”

 

  • “स्वीकार न कर पाने का एक ही कारण होता है : नैतिकता।”

 


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उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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