निर्जीव

  • ज़िन्दगी में जो कुछ भी बहुत हिफ़ाज़त, रखरखाव, संरक्षण माँगता हो वो मुर्दा है। उसको बचाना छोड़ दो। वो गिर जाएगा। हिफ़ाज़त करना छोड़ दो। ज़रा अनासक्ति चाहिए, निर्मम होना पड़ता है। जीवन से प्रेम होना चाहिए तभी मुर्दा बोझ को छोड़ सकते हो। प्रेम और अनासक्ति, बोध और निर्ममता एक साथ हैं।”

 

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उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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