ध्यान

  • आँखें बंद हों तो सूरज कभी नहीं उगता”

 

  • किसी ने उगता हुआ सूरज देखा किसी ने बरसात का सूरज देखा किसी ने अमेरिका में बैठकर देखा किसी ने अफ्रीका में बैठकर देखा और सबने देखा सूरज लेकिन आधा-तिरछा देखा या किसी माध्यम से देखा ।अब जो देखने वाले थे, वो चले गए जिन्होंने देखा था, वो चले गये उनकी लिखी किताबें बची हैं किताबों में ज़िक्र किसका है- ‘सूरज का और चश्मे कासूरज तो पढ़ने वाले जान नहीं पाते क्योंकि सूरज तो बताने की चीज़ नहीं है सूरज तो अनुभव करने की चीज है सूरज तो जान नहीं पाते हाँ, चश्मे को जान जाते हैं ।”

 

  • जो वास्तव में जानेगा वो विषय पर ही नहीं, जानने की पूरी प्रक्रिया पर भी पूरा-पूरा ध्यान देगा।”

 

  • ध्यान के अतिरिक्त मन की कोई और शक्ति नहीं |”

 

  • ध्यान है मन का स्वरस में डूबना।”

 

  • ध्यान संकल्प है बोध में उतरने का।”

 

  • अभ्यास नहीं, ध्यान।”

 

  • जो तुम्हें बार-बार ध्यान से हटा दे, तुम उस वस्तु या व्यक्ति को ही हटा दो। और कुछ करते बने तो उस स्थान से ही हट जाओ।”

 

  • विचार सदा संसार की ओर उन्मुख रहता है। हम दृश्य से बंधे रहते हैं और दृष्टा की ओर ध्यान नहीं दे पाते। बोध की ओर पहला कदम है कि हम संसार की जगह ज़रा अपने आप को ध्यान से देखें। यही आत्मज्ञान है – अपने कर्मों और विचारों का संज्ञान। और आत्मज्ञान गहराता जाए तो आत्मबोध होने की संभावना है। वहाँ विचार की तरंगें निर्विचार के मौन महासमुद्र में शांत होती जाती हैं।”

 

  • दुनिया पैसे की अंधी दौड़ है। उसकी वजह ज़रूरतें नहीं हैं, बल्कि यह क़ि जो मैं खरीदना चाहता हूँ वह पैसे से मिलता नहीं, पर मुझे लगता है कि शायद और पैसा कमाने से ख़रीदा जा सके। ध्यान से देखो तुम्हें वास्तव में किसकी चाहत है, और क्या उसे पैसे से खरीदा जा सकता है।”

 

  • जहाँ ध्यान नहीं, वहीं माया है। ध्यान के अभाव में लीला ही माया बन जाती है।”

 

  • “जाँचने से मेरा अर्थ विचार नहीं है, ध्यान है।”

 

  • “बुद्धिमान वही है जो साधारणतया कही गयी बात को, एक सामान्य से शब्द को भी इतने ध्यान से सुने कि उससे सारे रहस्य खुल जाएँ |”

 

  • “ध्यान और प्रार्थना का कोटा नहीं पूरा किया जाता। ध्यान और प्रार्थना में निरंतर रहा जाता है, उसमें जिया जाता है।”

 

  • “ध्यान आपको मुक्त करता है विचार से और दान मुक्त करता है वस्तु से।

    तो जब ध्यान और दान एक साथ हो जाते हैं तो आप विचार और वस्तु दोनों से मुक्त हो जाते हैं।”

 

  • “फ़ाएदा और नुकसान मैं जिसको मानता था, उसी के विसर्जन का नाम ही तो ध्यान है।”

 

  • “हमें यह बहुत ध्यान से देखना होगा, हमें डराने वाला तत्व, देखिए इसको आप सूत्र की तरह जीवन में इस्तेमाल कर सकते हैं, जब भी कभी कोई बहुत हावी हो रहा हो आपके ऊपर, कोई परिस्तिथि, कोई व्यक्ति, या कुछ भी, कोई विचार, तो उससे लड़िये मत, अपने मन को तलाशिये, उसमें ऐसा क्या है जिसका उपयोग करके वो व्यक्ति आपको नचा रहा है? अगर कोई आप पर हावी हो रहा है तो अपने मन को तलाशिये कि उसमें ऐसा क्या है जिसका उपयोग करके वह व्यक्ति आपको नचा रहा है।”

 

  • “आदमी जितना गहरे उतरता है, उतनी जगह कम बचती जाती है आगेपीछे के ख्याल के लिए।”

 

  • “किसी भी मानसिक बीमारी की कोई और दवा नहीं है। एक ही दवा है- ध्यान, जागरूकता, होश।”

 

  • “तुम इतिहास को इतिहास जानो, पुराणको पुराण जानो, इन दोनों में कुछ भी धर्म नहीं है |

पर अभी, अगर तुम ठीक ध्यान में हो, तो ये धर्म है।”

 

  • “समर्पण सीखा नहीं जाता, समर्पण हो जाता है, समर्पण ध्यान का फल है।”

 

  • “ध्यान है कि जब कीचड़ सामने आए, दिखे। ठीक तब दिखे। और तब नहीं दिखा, तो कभी नहीं दिखा। ठीक तब। ठीक अभी और कभी नहीं – यही ध्यान है। बाकी सब तो मनोरंजन है।”

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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