धर्म

  • धर्म परम नास्तिकता की कला है ।”
  • कर्तव्य जब समझ से प्रस्फुटित होता है, तो धर्म कहलाता है ।”

  • किसी ने उगता हुआ सूरज देखा किसी ने बरसात का सूरज देखा किसी ने अमेरिका में बैठकर देखा किसी ने अफ्रीका में बैठकर देखा और सबने देखा सूरज लेकिन आधा-तिरछा देखा या किसी माध्यम से देखा अब जो देखने वाले थे, वो चले गए जिन्होंने देखा था, वो चले गये उनकी लिखी किताबें बची हैं किताबों में ज़िक्र किसका है- ‘सूरज का और चश्मे कासूरज तो पढ़ने वाले जान नहीं पाते क्योंकि सूरज तो बताने की चीज़ नहीं है सूरज तो अनुभव करने की चीज है सूरज तो जान नहीं पाते हाँ, चश्मे को जान जाते हैं  ।”
  • “‘मैं जानता हूँ’-सबसे अधार्मिक वचन ।”
  • “धार्मिक आदमी वो नहीं है जो मंदिर जाता हो, धार्मिक आदमी वो है जिसे मंदिर जाने की आवश्यकता न पड़ती हो  |”
  • “जब तुम स्वयं जानते हो कि तुम्हें क्या करना चाहिए, तो वह कर्तव्य नहीं कहलाता, तब वह धर्म कहलाता है ।”
  • “धर्म पर चलो, कर्तव्य पर नहीं ।”
  • “प्रेम और धर्म एक साथ चलते हैं ।

            प्रेम महाधर्म है ।”

  • “हर धर्म का स्रोत एक है; धर्मों का धर्म, जीवन है ।”
  • धर्मका अर्थ होता है- बोध’, ‘धर्मका अर्थ होता है- प्रेम’, ‘धर्मका अर्थ होता है- हल्का, तनावमुक्त जीवन ।”

  • “जब कोई आदमी निमग्न होकर के, मौन हो कर के, शांत होकर के, ध्यान से जीवन को देखता है, पूरा-पूरा डूब कर के, तब उसको जो बोध मिलता है, उसी का नाम ‘धर्म’ है ।”

  • आप नहीं बता सकते हो कि अब क्या होने वाला है और आगे क्या होगाइसी अनिश्चितता का नाम धर्म है। 

  • “यही धर्म है आपका, कि जब दस लोग मूर्खता कर रहे हों, तो आप मूर्खता न करें । आप मूर्खता न करें तो उन दस के सुधरने की संभावना बढ़ जाती है ।”
  • “सारी धार्मिकता, आध्यात्मिकता, प्रज्ञता के केंद्र में एक बात होती है “सतत सुरती”, कांस्टेंट रिमेम्ब्रेंस – लगातार याद रखना और लगातार का मतलब है तब भी याद रखना और तब ही ज्यादा याद रखना जब दूसरी चीज़ें खींच रही हों, आकर्षित कर रही हों, मन कहीं और को भाग रहा है तब याद रखना है | इसीलिए भारत में प्रतीकों की, रिवाजों की, और रीचुअल्स की बड़ी कीमत रही है | हम अक्सर उनको यह बोलकर ठुकरा देते हैं कि यह सब तो यूँ ही है, आचरणगत बातें हैं, इन में कुछ रखा नहीं है | उनमें ही बहुत कुछ रखा है |”
  • “होश में आओ! यही एकमात्र धर्म है |”
  • “अरे धर्म हिन्दू, मुसलमान नहीं होता यार |धर्म, धर्म है – हिन्दू, मुसलमान कहाँ से आ गया ?”
  • “तुम इतिहास को इतिहास जानो, पुराणको पुराण जानो, इन दोनों में कुछ भी धर्म नहीं है |

पर अभी, अगर तुम ठीक ध्यान में हो, तो ये धर्म है ।”

  • “मात्र धार्मिक मन ही युद्ध कर सकता है ।”

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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