धन

  • गरीब रह पाना बहुत अमीरों का काम है। गरीब होता तो गरीब थोड़े ही होता। तुम्हारे पास जब प्रभु नहीं होता तब तुम धन इकट्ठा करते हो। धन्य वो जो वास्तविक धन को उपलब्ध हो जाता है।”

 

  • साधु तुम्हारे द्वार भिक्षा नहीं, तुम्हें मांगने आता है साधु अगर असली होगा तो वो तुमसे धन नहीं तुम्हें मांगेगा ।”

 

  • जिस इंसान की धन इकट्ठा करने में बड़ी रूचि है, वो अंदर से दरिद्र है। आतंरिक दरिद्रता ही उससे धन इकट्ठा करवा रही है ।”

 

  • धन्यता – जो धन्य हो गया है। जिसे वास्तविक धन प्राप्त हो गया है। मन का आत्मा से एक हो जाना – यही धन्यता है धन्यता – जो धन्य हो गया है। जिसे वास्तविक धन प्राप्त हो गया है। मन का आत्मा से एक हो जाना – यही धन्यता है ।”

 

  • जो मन को मारे वो वास्तविक धन है और जो मन की असुरक्षा से निकला हो वो नकली धन है।”

 

  • अगर तुम्हारे पास वो धन नहीं है जो संसार से आगे जाये तो तुम महागरीब हो।”

 

——————————————————

उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

Leave a Reply