द्वैत

  • संसार में कोई नहीं जो तुम्हें अद्वैत तक ले जा सके। जो खुद द्वैत में है वो कैसे अद्वैत का पता देगा? वो तो बाधा ही बनेगा। अद्वैत तक तो तुम्हें अद्वैत ही ले जाएगा। कैसे? ऐसे द्वैतपूर्ण सवाल पूछो !”

 

  • जीवन जीने की कला: पहला तल दूसरे से मिला रहे, साकार निराकार से मिला रहे, द्वैत अद्वैत में समाहित रहे, बाहर भीतर से एक रहे |”

 

  • समस्त द्वैत का आधार है अद्वैत।”
  • “द्वैत का  एक सिरा कभी छूटता नहीं। जो तुमसे घृणा छुड़वा रहा है, वो तुमसे आसक्ति भी छुड़वा रहा है।”

  • “मनुष्य से मूल भूल उसी दिन प्रारंभ हो गयी थी, जिस दिन उसने ये द्वैत खड़ा करा था कि “कहीं कोई ईश्वर है और बाकी सब कुछ उस ईश्वर की रचना है” | कोई रचना नहीं है, कोई रचनाकार नहीं है| कोई भेद नहीं है | न माया को ठुकराना है, न ब्रह्म को पाना है | माया और ब्रह्म का कोई पृथक अस्तित्व है ही नहीं | जो माया और ब्रह्म को पृथक देख रहा है, वो ब्रह्म को नहीं जानता | जिसने ब्रह्म को जान लिया, उसके लिए माया बचेगी नहीं |”

 

  • द्वैत का मतलब हुआ तड़प। मुझसे बाहर कुछ है जो मुझे पाना है और मुझे उसकी तलाश है। जब तक मिल नहीं रहा, मैं तड़प रहा हूँ, इसी का नाम द्वैत है।

 

  • “द्वैत का अर्थ ही यही है: “मैं तुझ पर आश्रित, तू मुझ पर आश्रित।”

 

  • “दृश्य और द्रष्टा – द्वैत के दो सिरे|”

 

  • “अद्वैत को और पाओगे कहाँ द्वैत के अलावा?”

 

  • “द्वैत में गहराई से बैठना ही तो अद्वैत है। और क्या है?”

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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