त्याग

  • आध्यात्म पलायन नहीं | केवल अँधेरे और अज्ञान को त्यागना है, और कुछ नहीं |”

 

  • समझदार व्यक्ति संसार को इतना भी महत्व नहीं देता कि उसका परित्याग करे।”

 

  • जो त्यागना है वही मन के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है और यह सहजता नहीं है। आकर्षण, विकर्षण ।”

 

  • “• असली गुरु कौन? जिसे तुम कोशिश के बाद भी त्याग पाओ।”

 

  • त्याग – छोड़ना नहीं, जगना।”

 

  • गुरु स्थूल भी है, सूक्ष्म भी, इसलिए उसे त्यागा नहीं जा सकता। राम बस हमारी कल्पना है इसलिए उसे त्यागना आसान हो जाता है।”

 

  • डूबने का अर्थ है, प्रयत्न करने का प्रयास त्यागना।”

 

  • समर्पित होना मतलब अपने चुनाव करने का अधिकार त्यागना।”

 

  • रस ना छिलके में उलझे रहने से मिलेगा और ना ही गन्ने के परित्याग में। छिलके के इतने करीब जाओ कि उसके मूल तक ही पहुँच जाओ।”

 

  • संसार का अर्थ है- आप पूर्ण रूप से किसी के हो सके, और आप पूर्ण रूप से कुछ त्याग सके| जिसको पाया उसको पाया नहीं, जिसको छोड़ा उसको छोड़ा नहीं |”
  • “जो कुछ भी, तुममें कीमती लगता है दुनिया को, वही वो है, जो तुम्हें त्यागना चाहिए|”

  • “त्याग का अर्थ है अपनी क्षुद्रताओं को छोड़ते चलना क्योंकि विराट की उपलब्धि हो गयी है।”
  • “त्यागने का अर्थ है कि अब हमें छोटे में रुचि नहीं रही। क्योंकि जो भी कुछ छोटा है वही आपको दुखी करता है। छोटे को त्यागने का अर्थ है दुःख को छोड़ते चलना। पूर्ण आनंद मिल गया है, हम सुखदुःख को पकड़ने में उत्सुक नहीं हैं।”

  • “त्यागना चाहते हो तो त्यागने की कामना को भी त्याग दो।”
  • “त्यागने के लिए ऐश्वर्य का भाव होना चाहिए। त्यागने क लिए छलछलाता जाम होना चाहिए। इतना है! और कितना मांगें? त्यागने के लिए विभुता होनी चाहिए।”

  • “त्यागने के लिए, जिसे तुम त्याग रहे हो, उससे कहीं बड़ा कोई अवलंबन चाहिए- सहारा! जब तक वह सहारा नहीं मिला, तब तक छोटे सहारे को कैसे त्यागोगे? त्यागने की बात नहीं करो। उस बड़े को पाने की बात करो!छोड़ना नहीं है, पाना है।”

  • “अमूल्य से निकटता ही मूल्यहीन का त्याग है।”

 

  • “जो कुछ भी, तुममें कीमती लगता है दुनिया को, वही वो है, जो तुम्हें त्यागना चाहिए| जो तुम्हारे भीतर वास्तव में कीमती है, संसार कभी उसकी कीमत नहीं कर पाएगा, संसार कभी उसे मूल्य नहीं दे पाएगा| संसार तो तुम्हारी बीमारियों को ही मूल्य देता है।”

 

  • “मन, मन रहता ही तब तक है, जब तक उसमें परस्पर विरोधी विचार उठते-गिरते रहते हैं।”

 

  • “जो असत्य है, जो मिथ्या है, उसको कीमत ना देना ही त्याग है।”

 

  • “त्याग का वास्तविक अर्थ छोड़ना नहीं है, जग जाना है।”

 

  • “मन की ही पकड़ जब ढीली हो जाए, वही कुर्बानी है। पर मन की पकड़ ढीली तब होगी, जब मन को पहले ये दिखाई दे, कि कुछ और है जो बेशकीमती है, और मुझे उस दिशा जाना है।”

——————————————————

उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

Leave a Reply