डर

 

  • जो भयानक है वो कुछ छीन नहीं सकता,जो आकर्षक है वो कुछ दे नहीं सकता।”

 

  • जब शरीर से तादात्म्य होता है तब हर भय मृत्यु का ही होता है। मृत्यु एक घटना नहीं है जो घटेगी इस शरीर के साथ। मृत्यु एक विचार है जो हर पल घट ही रहा है ।”

 

  • हम जीवन ऐसा जीते हैं कि हमारी हर गतिविधि को ऊर्जा भय और लोभ से ही मिलती है।”

 

  • जो सत्य से दूरी बना बैठे हैं, उनकी सज़ा है वो भय। वो संशय में ही जियेंगे”

 

  • जिस अधूरे मन से कदम उठाते हैं समर्पण के लिए, उसी अधूरे मन से भय उठता है।”

 

  • जो भयभीत है उसके लिए भय ही विधि है।”

 

  • मौत के ख़ौफ़ को तरक्की का नाम देना, इससे वीभत्स बात हो ही नहीं सकती। हर व्यवसायिक गतिविधि मौत का डर है।”

 

  • असुरक्षा के भाव से किये गए हर कर्म से हम ये उम्मीद करते हैं कि उससे सुरक्षा मिल जायेगी। बिना डर के तो हमें साँस लेना भी नहीं आता।”

 

  • मन गहरा समुद्र है जो डर से भरा हुआ है। इसी समुद्र को भवसागर कहते हैं, इसी के पार जाना है।”

 

  • डर बाहर कहीं नहीं होता। सारा का सारा डर मन है। पूरा मन डर है। अपने मन में पैठ कर के देखना है कि चल क्या रहा है। डर मन में है और मन डर है | मन की हरेक तरंग डर है | मानसिक गतिविधि लगातार चल रही है और उसी में हमें पैठना है”

 

  • हमें सबसे ज़्यादा डर अपने आप से लगता है। डरने वाले भी हमीं, डराने वाले भी हमीं, और डर से मुक्ति भी हमीं। क्या खेल है!”

 

  • डर क्या है? डर मन की वो स्थिति है जिसमें में वो सरल सम्मुख अनंत सत्य की गोद से विलग है। डर मन की वो स्थिति है जिसमें उसने अपनी ही काल्पनिक, सीमित, मर्त्य दुनिया को सत्य मान लिया है।”

 

  • हमें पता है कि सब बदल जाता है, पर इस बात का डर भी बना रहता है कि इस बदलने से हमारा कुछ बिगड़ जाएगा।”

 

  • साधारण मन को रस अपने छोटे होने के डर में या बड़प्पन की लालसा में आता है। जो दास हो गया उसे तो बस कृष्ण के सुमिरन में ही रस आता है।”

 

  • जीतने का भाव इस बात की पुष्टि है कि हारने का डर है। जो जीतने की कोशिश में लगा हुआ है वह जीवन नष्ट कर रहा है क्योंकि समय तुमसे तुम्हारी हर जीत छीन लेता है। कभी कोई जीत आखिरी हुई है?”

 

  • जिसे मिटने का जितना ख़ौफ़ है उतना ही वह अपने निशान छोड़ने की कोशिश करता है।”

 

  • जो तुम्हें मिलना ही है, जो भी कुछ कीमती है, उसके और तुम्हारे बीच बस डर है।”

 

  • डरते हो क्योंकि भूले बैठे हो।”
  • “भय का प्रत्येक क्षण, मृत्यु का क्षण है।”
  • “डर जब बाहर की ओर बहता है तो हिंसा के रूप में दिखाई देता है और हिंसा जब अपने ही मन पर छा जाती है तो वो डर के रूप में दिखाई देती है।”

  • “दुनिया से वही डरते हैं जो परमात्मा से भगते हैं ।”
  • “डर तुमसे बाहर थोड़े ही है कुछ; न क्रोध, न कामना, न संचय, अपने आपको जो मानते हो, वही है।”
  • “जो जितना डरा हुआ रहेगा वो भविष्य के बारे में उतना विचार करेगा, उतना संचय करेगा, उतनी तैयारी करेगा, उतनी योजनाएँ बनाएगा| तुम्हारा डर कितना गहरा है, ये जानना हो तो बस ये देख लो कि तुम्हारे मन में भविष्य कितना घूमता रहता है।”

 

  • “निर्भय होने का अर्थ है कि भय का विचार ही नहीं ।”

 

  • “जब डर जाता है, मोह जाता है तब न सिर्फ़ समझदारी का सूरज उगता है बल्कि प्रेम का गीत भी उठता है।”

 

  • “निर्भय बनो, अभय नहीं ।”

 

  • “डर क्या है? ये विचार की मेरा कुछ खो सकता है, मैं किसी पर आश्रित हूँ, जिस पर आश्रित हूँ वो मेरा कुछ छीन सकता है| तुम्हारा होना ही दूसरे पर आश्रित है, तुम हो ही इसीलिए क्योंकि दूसरा है, तुम उसी दिन तक हो ना जिस दिन तक दुनिया है|”

 

  • “‘हम डरे हुए हैं कि हमारा कुछ बुरा न हो जाए।’ पर डर से बुरा और क्या होगा?”

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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