ज्ञान

  • भूल का कोई सुधार नहीं होता। कोई आकस्मिक गलती नहीं हुई है – आप जो हो आपसे यही होना था। संयोगवश धोखा नहीं हुआ है, आप जो हो आप बार-बार यही करोगे। आपके रहते भूल सुधारी नहीं जा सकती, सुधारने की कोशिश मात्र एक प्रपंच है। भूलों से भरे जीवन को देख अपने मन का ज़रूर पता लग सकता है – यह आत्मज्ञान होता है। आत्मज्ञान में मन, कर्म, जीवन स्वयमेव बदल जाते हैं।”

 

  • शुद्धतम रूप से गुरु बोध मात्र है। आत्मज्ञान, आत्मविचार ही आत्मबोध बन सकता है। आत्मविचार में जब तुम अपने आप को देखते हो, तभी संभव होता है गुरु का तुम्हारे लिए कुछ कर पाना। जो स्वयं को देखने को राज़ी नहीं, गुरु उसके लिए कुछ नहीं कर पायेगा। गुरु ही प्रेरणा देता है आत्मविचार की, और आत्मविचार का आखिरी फल होता है आत्मबोध – यानि गुरु की प्राप्ति। गुरु से ही आदि, गुरु पर ही अंत; गुरु ही है आत्मा अनंत।”

 

  • विचार सदा संसार की ओर उन्मुख रहता है। हम दृश्य से बंधे रहते हैं और दृष्टा की ओर ध्यान नहीं दे पाते। बोध की ओर पहला कदम है कि हम संसार की जगह ज़रा अपने आप को ध्यान से देखें। यही आत्मज्ञान है – अपने कर्मों और विचारों का संज्ञान। और आत्मज्ञान गहराता जाए तो आत्मबोध होने की संभावना है। वहाँ विचार की तरंगें निर्विचार के मौन महासमुद्र में शांत होती जाती हैं।”

 

  • बोध होने में है, ज्ञान में नहीं। जानने और जानने के पार जो है, वह बोध है। बोध एक शक्ति है, जागृति है।”

 

  • वास्तविक ज्ञान वही है जो पहले से संचित ज्ञान को साफ़ करे और फ़िर स्वयं को भी मिटा दे।”

 

  • भक्ति इस आखिरी बात का ज्ञान है कि नक़ली को नक़ली जान पाने की ताक़त नक़ली नहीं दे सकता। और जब ये ज्ञान गहरे रूप में बैठ जाता है तो सिर श्रद्धा में झुक जाता है, यही भक्ति है।”

 

  • भक्ति इस बात को नमन है कि मुझसे विराट, मुझसे सुंदर और मुझसे कहीं असली कोई और है। भक्ति परम ज्ञान है।”

 

  • अज्ञान के कारण ही विश्व, विश्व जैसा भासित होता है |”

 

  • मूल भी तुम, फूल भी तुम, आत्मा भी तुम, जीव भी तुम| यही ज्ञान है, यही प्रेम है और यही आहिंसा है| ज्ञान जब गहरा होता है, तब प्रेम बन जाता है |”

 

  • मनुष्य एक तल पर अंतहीन भटकाव है और दूसरे तल पर शांत बिंदु | उसके एक तल पर गहरे से गहरा अज्ञान, अन्धकार है और दूसरे तल पर साफ़ ज्ञान की रोशनी |”

 

  • आध्यात्म पलायन नहीं | केवल अँधेरे और अज्ञान को त्यागना है, और कुछ नहीं |”

 

  • ज्ञान सबको काटता है और ज्ञान को काटती है भक्ति। ज्ञान को अंत में भक्ति चाहिए ताकि अंत में काटने वाला घुल जाये।”

 

  • भक्ति हमेशा दूसरे(असीम) को महत्व देती है और उसे अंत में ज्ञान की आवश्यकता होती है जो इस बात को काट दे कि दो हैं। तभी विलय संभव हो पाता है, वियोग खत्म हो पाता है।”

 

  • ज्ञान ऐसा हो की जिसकी जब ज़रूरत हो तो याद भी आये। और जब ज़रूरत हो तो स्वतः उठ खड़ा हो जाये।”

 

  • ज्ञान इकट्ठा करके नहीं जान पाओगे।”

 

  • चलो ज्ञान में, पर स्थित बोध में रहो।”

 

  • अंतस को लेके ये कैसा अज्ञान कि हर किसी को चाहिए बस रोटी, कपड़ा और मकान?” 

 

  • “ज्ञान वो है जो अज्ञान को काटे। पर ज्ञान के साथ दूषण ये होता है कि वो अज्ञान को तो काट देता है, लेकिन स्वयं बच जाता है। गुणातीत होने का अर्थ है कि अज्ञान नहीं रहा, और अज्ञान के बाद अब ज्ञान भी नहीं रहा। अब तो शान्त बोध है। उसी शान्त, खाली बोध को साक्षित्व कहते है।”

 

  • “भक्त परम ज्ञानी होता है।”

 

  • “जो झूठा सन्यासी होता है, वो संसार से दूर भागता है और जो असली ज्ञानी होता है वो संसार के भीतर प्रवेश कर जाता है। और फिर संसार के केंद्र में जो रस बैठा है, जो हरि बैठा है, जो आत्मा बैठी है, वो वहाँ तक पहुँच जाता है।”

——————————————————

उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

Leave a Reply