चिंता

  • हर कदम तुम्हें बदल देता है। अगले कदम पर तुम तुम नहीं रहोगे। इसीलिए आगे के क़दमों की कल्पना या चिंता करना व्यर्थ है। तुम बस अभी जहाँ हो वहाँ से उठते एक कदम की सुध लो।”

 

  • “सोचने के अलावा और कोई चिंता नहीं होती। चिंता को तुम सोचने से अलग मत समझ लेना, जब तुम कहो कि मुझे चिंता हो रही है, तो उसका अर्थ बस इतना ही है कि तुम चिंतित विचार कर रहे हो। चिंता, विचार और सोच से अलग कुछ भी नहीं होती।”

 

  • “न चिंता न चाहत, स्वभाव तुम्हारा है बादशाहत|”

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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