कृष्ण

  • साधारण मन को रस अपने छोटे होने के डर में या बड़प्पन की लालसा में आता है। जो दास हो गया उसे तो बस कृष्ण के सुमिरन में ही रस आता है।”

 

  • एक योगी तो संसारी को पहचान जाता है, पर एक संसारी योगी को नहीं पहचान सकता | तुम्हारे सामने से कृष्ण निकल जाएं, तुम पहचान नहीं पाओगे |”

 

  • हमने दुर्योधन की तरह कृष्ण (सत्य) की जगह उनकी नारायणी सेना (संसार) को चुन रखा है। और चुनाव ऐसा हो तो हार तो पक्की है ही।”

 

  • ज़ेन में पोले बांस जैसा होने की बात कही जाती है। अप्रतिरोध, समर्पण से संगीत पैदा होता है। वही कृष्ण की मुरली भी है।”


  • “कृष्ण ही तो कृष्ण की दुनिया हैं न। तो सीधेसीधे तुम गीता को पढ़ो या फिर चाहे इस दुनिया को पढ़ो, कोई अंतर तो नहीं है। दोनों ही कृष्ण की हैं।”

 

  •  “कृष्ण तक तो कृष्ण की ही बात पहुंचेगी और कृष्ण की इच्छा से ही पहुंचेगी।”

 

  • “कृष्ण प्रकृति के साथ रास ही नहीं करते, कृष्ण प्रकृति ही हैं।”

 

  • “कृष्ण बंधते हैं तो वो कृष्ण की मौज है क्योंकि कृष्ण में कुछ ऐसा है जो बाँधा जा ही नहीं सकताजो हमेशा मुक्त है।”

 

  • “कृष्ण बस वही है, जो हर बच्चा होता है।”

 

  • “तुममें से, जो भी लोग, किसी का प्रेम पाना चाहते हों, अच्छे से जान लें, कि प्रेम का पात्र, मात्र परमात्मा होता है।”

 

  • “हम में से हर कोई राधा है, हम सब कृष्ण की ही प्रतीक्षा कर रहे हैं।”

 

  • “कृष्ण की मुरली दूसरी है, वो दिल में बजती है| और अगर दिल में नहीं बज रही बाहर-बाहर ही सुनाई दे रही है तो आपने कुछ सुना नही| बुल्लेशाह की काफी हो, ऋभु के वचन हो, किसी संत, किसी ऋषि की वाणी हो, जब उसको सुनियेगा तो ऐसे ध्यान से सुनियेगा कि कान बेमानी हो जाएँ, अनुपयोगी हो जाएँ| फिर आप कहें कि अब कानो पे ध्वनि पड़े न पड़े, शब्द भीतर गूंजने लगा है| शब्द तो माध्यम था, तरीका था, साधन था, आग अब लग गयी| हमारे भीतर लग गयी है| मुरली बज गयी, अब हमारे भीतर बज रही है, अब उसे नहीं रोका जा सकता |”

 

  • “कृष्ण तब हुए तुम, जब प्रकृति से एक होने के लिए, प्रकृति को तुम्हें आवृत ना करना पड़े, तब कृष्णत्व है। जब सामने वाले को पूरी तरह जानते हो, और फिर भी वो प्यारा लगे, तो तुम कृष्ण हुए।”

 

  • “जगते में जागे नहीं सोते नहीं सोए, वही जाने कृष्ण को दूजा न कोय|”

 

  • “कृष्णत्व का मतलब समझते हो? कृष्णत्व का मतलब वो सब कुछ, जो प्यारा है। कृष्ण माने जो प्यारा है, जो खींचता है अपनी ओर, जो मोहित करता है।”

 

  • “अभ्यास माने, कृष्ण को याद रखना, वैराग्य माने, लीला को लीला जानना।लीला को लीला नहीं जाना तो सताए जाओगे, फिर लीला माया कहलाती है ।”

——————————————————

उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

Leave a Reply